
देवता
भगवान विष्णु एवं चंद्र देव
तिथि / समय
प्रत्येक मास की शुक्ल पूर्णिमा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
पूर्णिमा को सत्य एवं शुद्धि की तिथि माना गया है। परंपरा में पूर्णिमा का उपवास करने से मन-शुद्धि एवं पितृों की तृप्ति होने का वर्णन आता है। कथा-परंपरा में पूर्णिमा को चंद्रमा की पूर्ण कांति का प्रतीक मानकर इस दिन की साधना से जीवन की अधूरिता पूर्ण होने का विश्वास जोड़ा गया है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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पूर्णिमा के दिन उपवास अथवा एक समय भोजन रखें। विष्णु-चंद्र पूजा करें, सायं चंद्र-दर्शन कर अर्घ्य दें तथा क्षमा-प्राथना करें। खीर का भोग लगाकर प्रसाद बाँटें। विशेष पूर्णिमाओं (गुरु, शरद, कार्तिक आदि) की अलग विधियाँ नीचे भाग 3 में दी गई हैं। बारह मासों की पूर्णिमाओ की सूची तालिका में दी गई है।
पूजा सामग्री
- जल-कलश
- फूल
- फल
- खीर (भोग)
- चंदन
- श्वेत वस्त्र
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
मन-शुद्धि, पाप-क्षय, पितृ-तृप्ति एवं मानसिक शांति।
व्रत कथा
पूर्णिमा को सत्य एवं शुद्धि की तिथि माना गया है। परंपरा में पूर्णिमा का उपवास करने से मन-शुद्धि एवं पितृों की तृप्ति होने का वर्णन आता है। कथा-परंपरा में पूर्णिमा को चंद्रमा की पूर्ण कांति का प्रतीक मानकर इस दिन की साधना से जीवन की अधूरिता पूर्ण होने का विश्वास जोड़ा गया है।
कथा है कि एक नगर में एक साधु रहते थे, जो प्रत्येक पूर्णिमा को निराहार रहकर चंद्रोदय के समय जल-कलश से चंद्र को अर्घ्य देते एवं रात्रि में विष्णु-भजन करते। उनके शिष्य ने एक बार प्रश्न किया, 'गुरुवर, अमावस्या में भी चंद्र है, पूर्णिमा में भी; फिर पूर्णिमा की उपासना की विशेषता क्या है?' साधु ने कहा, 'अमावस्या संकलन एवं त्याग की तिथि है, पूर्णिमा पूर्णता एवं आभास की तिथि है। ज्यों ही चंद्र पूर्ण होता है, मन का चंचलपन न्यूनतम हो जाता है; यही कल्याण की अवस्था है। जो पूर्णिमा की रात्रि जागरण एवं क्षमा-व्रत से बिताता है, उसके पाप क्षीण होते हैं।'
साधु की वाणी का प्रभाव उस नगर पर पड़ा तथा लोग पूर्णिमा व्रत को अपनाने लगे। जिन गृहस्थों ने यह व्रत आरंभ किया, उन्होंने अपने जीवन में सुख-वैभव का संतुलन देखा। विधि के अनुसार पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य का महत्त्व भी रहा है, अन्न, वस्त्र तथा जल-कुम्भ का दान करने से तिथि का फल वृद्धिगत होता है।
परंपरा का निष्कर्ष यह है कि पूर्णिमा व्रत मन को पूर्णता की दिशा देता है तथा चंद्र-देव की कृपा से मानसिक शांति प्रदान करता है। यह व्रत गृहस्थ-जीवन की समग्र उन्नति तथा चित्त-वृद्धि का कारण बनता है। यह व्रत एकाग्रता से करने पर चिरस्थायी फल देने वाला माना गया है।
सामान्य प्रश्न
मन-शुद्धि, पाप-क्षय, पितृ-तृप्ति एवं मानसिक शांति।
