देवता
भगवान शिव एवं माँ पार्वती
तिथि / समय
प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी, मास में दो बार; शनिवार प्रदोष विशेष फलदायी
श्रेणी
Pradosh व्रत
व्रत का परिचय
शिव पुराण की परंपरा के अनुसार देवताओं ने क्षीरसागर-मंथन के पश्चात् प्रदोष-काल में शिव की उपासना की थी तथा उनकी कृपा से अमृत-संबंधी विघ्न दूर हुए थे। परंपरा में प्रदोष का विशेष संबंध त्रिपुर-संहार से भी जोड़ा गया है, कथा है कि त्रिपुर नाम के तीन दैत्यों ने दीर्घ तप के बल से अजेय दुर्ग बनवाए तथा तीनों लोकों में अत्याचार करने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने प्रदोष-काल में एक ही बाण से तीनों दुर्गों का विनाश किया तथा दैत्यों का संहार किया। इसीलिए जो प्रदोष-काल शिव-पूजा का नियम से पालन करता है, उसकी समस्त पीड़ा एवं भय विनष्ट होते हैं।
व्रत विधि
कैसे रखें
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सायंकाल प्रदोष-काल (सूर्यास्त के लगभग एक-डेढ़ घंटे पूर्व से रात्रि प्रारंभ तक) में शिव मंदिर में पूजा करें, नटराज दर्शन करें तथा शिवलिंग पर जल-दूध अर्पित करें। दिन भर उपवास रखें एवं प्रदोष-काल की पूजा के उपरांत एक समय भोजन करें। शनिवार का प्रदोष शनि एवं शिव दोनों की प्रसन्नता करने वाला माना गया है। प्रदोष के दिन शिव-महात्म्य कथा का श्रवण एवं रुद्र-पाठ का विधान विशेष फलदायी माना गया है।
पूजा सामग्री
- जल
- कच्चा दूध
- बेलपत्र
- चंदन
- धूप-दीप
- फल
- श्वेत वस्त्र
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
रोग-शोक का नाश, धन-प्राप्ति, सतीत्व की रक्षा एवं शिव-कृपा।
व्रत कथा
शिव पुराण की परंपरा के अनुसार देवताओं ने क्षीरसागर-मंथन के पश्चात् प्रदोष-काल में शिव की उपासना की थी तथा उनकी कृपा से अमृत-संबंधी विघ्न दूर हुए थे। परंपरा में प्रदोष का विशेष संबंध त्रिपुर-संहार से भी जोड़ा गया है, कथा है कि त्रिपुर नाम के तीन दैत्यों ने दीर्घ तप के बल से अजेय दुर्ग बनवाए तथा तीनों लोकों में अत्याचार करने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने प्रदोष-काल में एक ही बाण से तीनों दुर्गों का विनाश किया तथा दैत्यों का संहार किया। इसीलिए जो प्रदोष-काल शिव-पूजा का नियम से पालन करता है, उसकी समस्त पीड़ा एवं भय विनष्ट होते हैं।
एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार भी है, एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था, जिसके घर सुख का अकाल छाया रहता था। उसकी पत्नी शिवभक्त थी तथा प्रति प्रदोष पर व्रत-पूजा करती थी। पति प्रायः व्यंग्य करता, 'घर में अन्न नहीं और तू दूध-बेलपत्र अर्पित करती है।' पत्नी कहती, 'आशा रखो, प्रदोषेश्वर बड़े दाता हैं।' एक प्रदोष की सायं पति-पत्नी शिवालय से लौट रहे थे, तो मार्ग में एक लोहार के घर के द्वार पर कुछ वस्तुएँ बिखरी दिखाई दीं; उन्होंने वे नहीं उठाईं और सीधे घर आ गए। अगले दिन राज-आज्ञा से वही वस्तुएँ परीक्षा के रूप में नगर के कुछ दरवाजों पर रखी गई थीं; जो व्यक्ति उन्हें उठाता, वही चोर माना जाना था। ब्राह्मण-दंपत्ति के सतीत्व-परीक्षा का यही दान था। नगर के प्रमुख व्यापारी ने उन्हें स्वयं अपने आश्रय में रखा तथा ब्राह्मण को अपने व्यापार का अधिकारी बनाया।
कुछ समय में ब्राह्मण धनवान हो गया, पर उसकी पत्नी का प्रदोष व्रत ज्यों का त्यों बना रहा। नगर में उसकी दानशीलता एवं सतीत्व की प्रसिद्धि फैल गई। परंपरा का निष्कर्ष यह है कि प्रदोष-व्रत से धन, सतीत्व की रक्षा, रोग-शमन एवं भय-नाश होता है। प्रदोष-काल को शिव-कृपा का विशेष समय माना गया है, क्योंकि इस समय शिव कल्याणकारी एवं प्रसन्न मूर्ति में भक्तों की वाणी सुनते हैं। शनि-प्रदोष से शनि-दोष की शांति तथा सोम-प्रदोष से संतान-सुख की प्राप्ति बताई गई है।
सामान्य प्रश्न
रोग-शोक का नाश, धन-प्राप्ति, सतीत्व की रक्षा एवं शिव-कृपा।
