
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
भागवत पुराण के सातवें स्कंध में प्रह्लाद-चरित का वर्णन आता है, कथा है कि हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य-राज ब्रह्मा जी से अमरता का वर माँगना चाहता था; अमरता मिलना संभव नहीं था, अतः उसने अद्भुत वरदान पाया कि उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात में, न घर के भीतर हो न बाहर, न मनुष्य से हो न पशु से, न अस्त्र से हो न शस्त्र से, न भूमि पर हो न आकाश में। इस वर के अहंकार में उसने स्वयं को भगवान घोषित किया तथा समस्त जगत में विष्णु-नाम के उच्चारण को वर्जित कर दिया।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
भागवत पुराण के सातवें स्कंध में प्रह्लाद-चरित का वर्णन आता है, कथा है कि हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य-राज ब्रह्मा जी से अमरता का वर माँगना चाहता था; अमरता मिलना संभव नहीं था, अतः उसने अद्भुत वरदान पाया कि उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात में, न घर के भीतर हो न बाहर, न मनुष्य से हो न पशु से, न अस्त्र से हो न शस्त्र से, न भूमि पर हो न आकाश में। इस वर के अहंकार में उसने स्वयं को भगवान घोषित किया तथा समस्त जगत में विष्णु-नाम के उच्चारण को वर्जित कर दिया।
उसी हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद थे, शुक्राचार्य-पुत्रों के शिष्यों में पढ़ते हुए भी उनका चित्त भगवान विष्णु के चरणों में लगा रहता। नारद के संस्कार से प्रह्लाद ने गर्भ में ही विष्णु-भक्ति पा ली थी। पिता ने जब उन्हें विष्णु-स्मरण से रोका, तब प्रह्लाद ने कहा, 'हरि सर्वत्र हैं, स्तंभ में, वृक्ष में, कण-कण में।' हिरण्यकशिपु ने अनेक उपाय किए, सर्पों से डसवाया, हाथियों से कुचलवाया, जल-गर्भ में डाला, विष दिया, प्रत्येक बार विष्णु-कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे।
अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की शरण ली। होलिका को अग्नि में अविनाशी रहने का वर प्राप्त था। उसने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर अग्नि-कुंड में बैठने का निश्चय किया, वरदान के अनुसार उसे अग्नि जला नहीं सकती थी। परंतु होलिका का वरदान अधर्म-प्रयोग में फल न दे सका, अग्नि में होलिका भस्म हो गई तथा प्रह्लाद अग्नि-कुंड के मध्य हंसते हुए निकले। होलिका-दहन की परंपरा इसी प्रसंग की स्मृति है, भक्ति-रक्षा का प्रतीक।
क्रोध से व्याकुल हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा, 'तेरा हरि यदि सर्वत्र है तो इस स्तंभ में भी है क्या?' प्रह्लाद ने विनम्रता से कहा, 'हाँ, पिता, ईश्वर स्तंभ में भी हैं।' हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा से स्तंभ प्रहार किया, स्तंभ विदीर्ण हुआ तथा वहाँ से भयंकर एवं अद्भुत मूर्ति प्रकट हुई, नर-शरीर-सिंह-मुख, नृसिंह भगवान। यह प्रकट संध्या-काल (न दिन न रात) में हुआ, द्वार-स्थल (न भीतर न बाहर पूर्ण रूप से) पर, भगवान ने दैत्य को अपनी जंघाओं में रखकर (न भूमि न आकाश) नखों से (न अस्त्र न शस्त्र) उसका वध किया। वर का प्रत्येक अक्षर सत्य रहा परंतु वर का अहंकार नष्ट हो गया।
नृसिंह भगवान का क्रोध शांत करने प्रह्लाद ने ही स्तुति की। भगवान ने प्रह्लाद को राज्य-ऐश्वर्य का आशीर्वाद दिया तथा भक्त-रक्षा का सनातन वचन दिया। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी पर नृसिंह-प्राकट्य की स्मृति में नृसिंह जयंती मनाई जाती है तथा फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या पर होलिका-दहन होता है। कथा का अमर उपदेश है, भक्ति का बल सर्वोच्च है; ईश्वर अपने भक्त के लिए नियमों की सीमा तक जाकर भी रक्षा करते हैं।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
