देवता
माँ दुर्गा (नवदुर्गा, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री)
तिथि / समय
चैत्र एवं आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक (नौ दिन)
श्रेणी
Navratri व्रत
व्रत का परिचय
देवी पुराण/मार्कंडेय पुराण की दुर्गा सप्तशती के अनुसार दैत्य महिषासुर का वध करने हेतु समस्त देवताओं की शक्तियों के संगम से देवी का प्राकट्य हुआ था। कथा के अनुसार महिषासुर ने घोर तप करके वरदान पाया था कि उसका वध पुरुष द्वारा न हो सके। इस वरदान के अहंकार में उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं को देवलोक से निकाल दिया।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
नौ दिन उपवास अथवा फलाहार रखें। घटस्थापना (कलश स्थापना, जौ बोना) करें, अखंड ज्योति जलाएँ तथा प्रतिदिन नवदुर्गा के एक-एक स्वरूप की पूजा करें। दुर्गा सप्तशती अथवा देवी कवच, अगला, कीलक का पाठ करें। अष्टमी/नवमी पर कन्या-पूजन (नौ कन्याओं का भोजन) तथा हवन करें। व्रत का उद्यापन कन्या-भोजन एवं दान से करें। रात्रि-जागरण तथा गरबा/रास (क्षेत्रीय) की परंपरा है।
पूजा सामग्री
- कलश
- जौ (घट)
- अखंड दीप
- लाल वस्त्र-चुनरी
- दुर्गा चित्र
- हवन-सामग्री
- कन्या भोजन सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
शक्ति-प्राप्ति, समस्त कष्ट-नाश, ऐश्वर्य एवं सिद्धि; मनोकामना-पूर्ति।
व्रत कथा
देवी पुराण/मार्कंडेय पुराण की दुर्गा सप्तशती के अनुसार दैत्य महिषासुर का वध करने हेतु समस्त देवताओं की शक्तियों के संगम से देवी का प्राकट्य हुआ था। कथा के अनुसार महिषासुर ने घोर तप करके वरदान पाया था कि उसका वध पुरुष द्वारा न हो सके। इस वरदान के अहंकार में उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और देवताओं को देवलोक से निकाल दिया।
देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की शरण में गए। तीनों महादेवों की अंग-कांति से एक दिव्य तेज उत्पन्न हुआ, जिसमें समस्त देवताओं की शक्तियाँ एकत्रित होकर एक अद्भुत देवी-स्वरूप की रचना कर गईं, शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, इंद्र का वज्र, समुद्र का हार एवं वस्त्र, हिमालय का सिंह, सब कुछ देवी को समर्पित कर दिया गया। देवी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर के साथ भीषण युद्ध किया।
महिषासुर अनेक रूप धारण करता रहा, भैंसा, सिंह, महाव्याघ्र, परंतु देवी ने प्रत्येक रूप का नाश किया। अंत में उसने भैंसे का रूप धारण किया; देवी ने त्रिशूल से उसका वध किया और उसका शिर धड़ से अलग कर दिया। देवताओं ने आनंद-उल्लास से देवी की स्तुति की और उन्हें 'महिषासुरमर्दिनी' कहा। इसी विजय-उत्सव की स्मृति में नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।
नवरात्रि के नौ दिन नौ दुर्गा-स्वरूपों की आराधना का विधान है, प्रतिपदा को शैलपुत्री, द्वितीया को ब्रह्मचारिणी, तृतीया को चंद्रघंटा, चतुर्थी को कूष्मांडा, पंचमी को स्कंदमाता, षष्ठी को कात्यायनी, सप्तमी को कालरात्रि, अष्टमी को महागौरी तथा नवमी को सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। शक्ति-उपासना के ये नौ दिन साधना, शुद्ध आहार तथा ब्रह्मचर्य के अनुशासन से जुड़े माने गए हैं। जो साधक नवरात्रि में विधिपूर्वक व्रत-उपासना करते हैं, उनके समस्त कष्ट दूर होते हैं तथा देवी-कृपा से ऐश्वर्य एवं सिद्धि की प्राप्ति होती है। कन्या-पूजन से देवी स्वयं प्रसन्न होकर वरदान देती हैं, यह लोक-विश्वास विशेष रूप से दृढ़ है।
सामान्य प्रश्न
शक्ति-प्राप्ति, समस्त कष्ट-नाश, ऐश्वर्य एवं सिद्धि; मनोकामना-पूर्ति।
