
देवता
नाग देवता (वासुकि, तक्षक, कालिय आदि अष्ट-नाग परंपरा)
तिथि / समय
श्रावण शुक्ल पंचमी
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा की कथा में जनमेजय राजा के सर्प-यज्ञ से नागों की रक्षा का प्रसंग है, अस्तिक ऋषि ने यज्ञ रोककर नागों की रक्षा की थी। कथा इस प्रकार है, पांडु-वंश के राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु सर्प-दंश (तक्षक-नाग) से हुई थी। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए जनमेजय ने सर्प-यज्ञ (सर्प-सत्र) आरंभ किया, जिसमें यज्ञ-वेदी से समस्त सर्प-जाति आकृष्ट होकर अग्नि में गिरने लगी।
व्रत विधि
कैसे रखें
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पंचमी को नाग-चित्र अथवा चाँदी की नाग-मूर्ति की पूजा करें। दूध, चंदन, अक्षत, फूल अर्पित करें तथा नाग-देवता से क्षमा याचना करें। ब्राह्मण को दूध-दान करें। सरल उपवास अथवा एक समय भोजन रखें। इस दिन भूमि खोदना, नागों को सताना तथा हल-चलाना वर्जित माना गया है। गौ-शाला अथवा नाग-वास स्थान (प्रायः पीपल/बरगद के नीचे) पर दूध अर्पित करने की परंपरा है।
पूजा सामग्री
- चाँदी/कागज/दीवार-चित्र की नाग-मूर्ति (सात फन वाला)
- दूध
- चंदन
- अक्षत
- फूल
- दीप
- कुमकुम
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सर्प-भय एवं विष-भय से मुक्ति, रोग-नाश, संतान-रक्षा एवं प्रकृति-सम्मान।
व्रत कथा
परंपरा की कथा में जनमेजय राजा के सर्प-यज्ञ से नागों की रक्षा का प्रसंग है, अस्तिक ऋषि ने यज्ञ रोककर नागों की रक्षा की थी। कथा इस प्रकार है, पांडु-वंश के राजा जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु सर्प-दंश (तक्षक-नाग) से हुई थी। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए जनमेजय ने सर्प-यज्ञ (सर्प-सत्र) आरंभ किया, जिसमें यज्ञ-वेदी से समस्त सर्प-जाति आकृष्ट होकर अग्नि में गिरने लगी।
नागलोक में भय का संचार हो गया। वासुकि नाग की बहन जरत्कारु के पुत्र आस्तिक ऋषि वेद-तत्त्वज्ञ थे। माता एवं वासुकि की प्रार्थना से आस्तिक यज्ञ-स्थल पहुँचे तथा उन्होंने यज्ञ-स्तुतियाँ सुनाकर जनमेजय को प्रसन्न किया। जब राजा ने वर माँगने को कहा, आस्तिक ने यज्ञ का तत्काल विराम (रोकना) ही वर माँग लिया। यज्ञ रुक गया तथा शेष नाग-जाति की रक्षा हो गई। यही प्रसंग नाग-पूजा के महात्म्य का आधार बना, सर्प-कुल की उपासना एवं क्षमा से सर्प-भय का नाश माना गया।
भागवत पुराण की कालिय-लीला भी इस पर्व से जुड़ी है, यमुना में कालिय नाग ने जल-विषाक्त कर दिया था। बालकृष्ण ने कालिय के फन पर नृत्य करके उसे वश में किया तथा उसे यमुना त्याग का आदेश दिया। कालिय की स्तुति से कृष्ण ने उसे क्षमा की तथा गरुड़-भय से रक्षा का वचन दिया। कालिय-मर्दन का यही प्रसंग नाग-क्षमा एवं विष-नाश का प्रतीक बना।
नाग पंचमी का व्रत करने वाले व्यक्ति को सर्प-भय, विष-भय तथा त्वचा-रोगों से मुक्ति मिलती है, यह लोक-विश्वास प्रचलित है। श्रावण में सर्प बाहर निकलते हैं, इसीलिए उनकी पूजा-क्षमा द्वारा सद्भाव बनाने की परंपरा जुड़ी है। दूध का अर्पण नाग-तुष्टि का प्रतीक है। यह व्रत प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश भी देता है, जो जीव भय का कारण है, उसी की उपासना से भय का नाश होता है, यही इस पर्व का गहरा भाव है।
सामान्य प्रश्न
सर्प-भय एवं विष-भय से मुक्ति, रोग-नाश, संतान-रक्षा एवं प्रकृति-सम्मान।
