
देवता
माँ गौरी (पार्वती)
तिथि / समय
श्रावण मास के सभी मंगलवार
श्रेणी
Mangalvar व्रत
व्रत का परिचय
कथा-परंपरा के अनुसार माँ पार्वती ने शिव को वर के रूप में पाने हेतु कठोर तपस्या की थी, इसीलिए सुहागिनों के लिए गौरी-व्रत सुहाग का सर्वश्रेष्ठ रक्षक बताया गया है। हिमालय-पुत्री पार्वती ने बाल्यावस्था से ही शिव को ही अपना पति स्वीकार किया था। नारद जी के संकेत से उन्होंने कालांतर में घोर तप का व्रत धारण किया, ग्रीष्म में पाँच अग्नियों के मध्य, वर्षा में खुले आकाश के नीचे तथा शरद में जल में खड़े होकर शिव-ध्यान किया। सहस्र वर्षों की तपस्या से त्रिलोक में कंपन हुआ तथा अंततः शिव जी स्वयं हिमालय-घर में आए, तप की परीक्षा लेकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हुए और विधिपूर्वक उनका विवाह पार्वती जी से संपन्न हुआ।
व्रत विधि
कैसे रखें
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स्नान के बाद माटी की गौरी (एवं गणेश) की स्थापना करें। सुहाग की वस्तुएँ, सिंदूर, चूड़ियाँ, मेहंदी, कजल, हल्दी, गौरी को अर्पित करके स्वयं श्रृंगार करें। षोडशोपचार पूजन करें, भोग लगाएँ तथा मंगला गौरी कथा का श्रवण करें। कन्याओं एवं सुहागिनों को भोजन-दान करें। निराहार अथवा फलाहार का नियम रखें। श्रावण के सभी मंगलवारों की पूजा संपन्न होने पर विधिपूर्वक विसर्जन-दान करें।
पूजा सामग्री
- माटी की गौरी-गणेश प्रतिमा
- सिंदूर
- चूड़ियाँ
- मेहंदी
- हल्दी
- पुष्प
- सुहाग-सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
चिरस्थायी सुहाग, सुयोग्य वर एवं गृह-कलह का नाश।
व्रत कथा
कथा-परंपरा के अनुसार माँ पार्वती ने शिव को वर के रूप में पाने हेतु कठोर तपस्या की थी, इसीलिए सुहागिनों के लिए गौरी-व्रत सुहाग का सर्वश्रेष्ठ रक्षक बताया गया है। हिमालय-पुत्री पार्वती ने बाल्यावस्था से ही शिव को ही अपना पति स्वीकार किया था। नारद जी के संकेत से उन्होंने कालांतर में घोर तप का व्रत धारण किया, ग्रीष्म में पाँच अग्नियों के मध्य, वर्षा में खुले आकाश के नीचे तथा शरद में जल में खड़े होकर शिव-ध्यान किया। सहस्र वर्षों की तपस्या से त्रिलोक में कंपन हुआ तथा अंततः शिव जी स्वयं हिमालय-घर में आए, तप की परीक्षा लेकर पूर्ण रूप से प्रसन्न हुए और विधिपूर्वक उनका विवाह पार्वती जी से संपन्न हुआ।
इसी परंपरा की एक लोक-कथा इस प्रकार है, एक ब्राह्मण की कन्या विवाह योग्य होने पर भी सुंदर थी तो थी, पर उसका विवाह किसी कारण से नहीं हो पा रहा था। ब्राह्मणी चिंतित होकर एक तपस्विनी के पास गई। तपस्विनी ने कहा, 'गौरी-तत्त्व सुहाग का मूल है। श्रावण में पड़ने वाले प्रत्येक मंगलवार मंगला गौरी का व्रत कर, माटी की गौरी बनाकर पूज और सुहाग-सामग्री अर्पित कर। गौरी की कृपा से योग्य वर अवश्य मिलेगा।' कन्या ने श्रावण के शुभ मंगलवारों में विधिपूर्वक व्रत किया, श्रृंगार-सामग्री माता को अर्पित की तथा सुहागिनों को भोजन-दान किया।
पूरे श्रावण के मंगलवार व्रत संपन्न होते-होते ही उसे एक योग्य ब्राह्मण वर मिल गया तथा उसका जीवन सुख-शांति से व्यतीत होने लगा। कन्या की माँ ने माटी की गौरी का विधिपूर्वक उद्यापन कर विसर्जन दान किया तथा उस समय तक पुनः कथा-वाचन कराया।
मंगला गौरी व्रत मुख्यतः सुहाग की अक्षयता की कामना से किया जाता है। विधि के अनुसार व्रती स्त्री इस दिन स्वयं भी सुहाग का पूर्ण श्रृंगार करती है और माता को सिंदूर, चूड़ी, मेहंदी अर्पित करती है, इस अर्पण का अर्थ है सुहाग को माता के चरणों में समर्पित करके उसकी रक्षा माँगना। कथा-परंपरा का निष्कर्ष है कि श्रावण मंगलवार की गौरी-पूजा से अविवाहित कन्या को सुयोग्य वर तथा सुहागिन को चिरस्थायी सुहाग की प्राप्ति होती है।
सामान्य प्रश्न
चिरस्थायी सुहाग, सुयोग्य वर एवं गृह-कलह का नाश।
