
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Karwa Chauth व्रत
व्रत का परिचय
करवा चौथ की पोथी-परंपरा में वीरवती की कथा के अतिरिक्त करवा नाम की सती स्त्री की कथा भी प्रसिद्ध है। कथा है कि एक नगर में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री रहती थी। वह अत्यंत सती-शील एवं पति-समर्पित थी। एक दिन वह अपने पति के साथ नदी-तट पर गई। पति नदी में स्नान कर रहा था। उसी समय एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया तथा उसे जल-गहन में खींचने लगा।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
करवा चौथ की पोथी-परंपरा में वीरवती की कथा के अतिरिक्त करवा नाम की सती स्त्री की कथा भी प्रसिद्ध है। कथा है कि एक नगर में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री रहती थी। वह अत्यंत सती-शील एवं पति-समर्पित थी। एक दिन वह अपने पति के साथ नदी-तट पर गई। पति नदी में स्नान कर रहा था। उसी समय एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया तथा उसे जल-गहन में खींचने लगा।
पति की पुकार सुनकर करवा ने शीघ्र आकर नदी-किनारे खड़ी होकर वीरतापूर्वक उस मगरमच्छ को अपने सूत-गठे (करवा-पूजा के दोरे) से बाँध दिया। मगरमच्छ को वश में करके उसने यमराज को पुकारा, 'हे यमराज, यह मगर मेरे पति का हत्यारा है; इसे इसके कर्म का फल दो।'
यमराज के दूत आए, परंतु करवा के पति के प्राण-पाश को न छोड़ सके। करवा ने स्वयं यमराज को श्राप देने की बात कही कि यदि उसके पति के प्राण नहीं लौटाए गए तो वह यमराज को श्राप दे देगी, उसकी तप-शक्ति इतनी प्रबल थी। यमराज ने विचार किया कि किसी सती के श्राप से अपने धर्म-कार्य में विघ्न नहीं चाहिए। उन्होंने उसी समय उस मगरमच्छ को मृत्युलोक भेजकर करवा के पति को पुनः जीवन-दान दिया।
करवा के पति के दीर्घ जीवन की कथा फैल गई। तब से करवा चौथ के दिन सुहागिन स्त्रियाँ करवा (मिट्टी का पात्र) को जल से भरकर पूजती हैं तथा पूजा के बाद उसे दान कर देती हैं। करवा-पात्र का यह दान पति की आयु-रक्षा का प्रतीक बना, कथा में करवा ने सूत-गठे से भी बाँधा था, इसीलिए राखी-सूत्र के समान सुरक्षा-बंधन का भाव भी इस व्रत में समाहित है।
कथा का निष्कर्ष यह है कि पतिव्रत का तेज यम-धर्म को भी आदर देने पर मजबूर कर देता है। जो स्त्री निष्ठा एवं साहस से अपने पति की रक्षा का संकल्प लेती है, उसके सुहाग की रक्षा स्वयं धर्म करता है। करवा चौथ की पोथी में यह कथा वीरवती की कथा के साथ-साथ पढ़ी जाती है, दोनों कथाओं का सार एक ही है: सुहाग की रक्षा में श्रद्धा, सत्य एवं धैर्य का बल अजेय है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
