Karwa Chauth Vrat

करवा चौथ

परंपरा की कथा के अनुसार राजा के सात पुत्रों में सबसे छोटे भाई की पत्नी वीरवती ने बचपन में ही करवा चौथ का व्रत धारण किया था। एक बार वीरवती अपने ससुराल से मायके आ…

करवा चौथ व्रत

देवता

माँ गौरी एवं भगवान शिव-कार्तिकेय (पोथी में गौरी-शंकर-कार्तिकेय-गणेश)

तिथि / समय

कार्तिक (पूर्णिमान्त) कृष्ण चतुर्थी, चंद्रोदय के बाद व्रत-पारण

श्रेणी

Karwa Chauth व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा की कथा के अनुसार राजा के सात पुत्रों में सबसे छोटे भाई की पत्नी वीरवती ने बचपन में ही करवा चौथ का व्रत धारण किया था। एक बार वीरवती अपने ससुराल से मायके आई हुई थी। उसने करवा चौथ का निराजल व्रत रखा। सायं तक उसकी दशा देखकर उसके भाई दुखी हो उठे। भुखी बहन को देखकर सातों भाइयों ने मिलकर छल की योजना बनाई।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सरगी (माँ-सास द्वारा भेजा भोजन, फेनी, फल, मिठाई) खाकर निराजल उपवास रखें। दिन में महिलाएँ मेहंदी, सिंदूर, वस्त्राभूषण से सजती हैं। सायं महिलाएँ सामूहिक रूप से बैठकर गौरी-शंकर-कार्तिकेय-गणेश की पूजा करती हैं, करवा-छलनी से पूजा करती हैं तथा बार-बार करवा चौथ की कथा सुनती हैं। चंद्रोदय के बाद छलनी से चंद्र को अर्घ्य देकर पति के दर्शन करती हैं तथा पति पत्नी को जल- पान कराकर पारण कराता है। व्रत के समापन पर उपहार (सुहाग-सामग्री) ग्रहण करती हैं।

पूजा सामग्री

  • मिट्टी का करवा
  • छलनी
  • कथा की गौरी-शंकर-कार्तिकेय-गणेश-चंद्र चित्रित पोथी
  • सिंदूर
  • चूड़ियाँ
  • मेहंदी
  • छप्पन भोग- सामग्री

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

पति की दीर्घायु, सुहाग की अक्षयता, पारिवारिक सुख एवं गौरी-कृपा।

व्रत कथा

परंपरा की कथा के अनुसार राजा के सात पुत्रों में सबसे छोटे भाई की पत्नी वीरवती ने बचपन में ही करवा चौथ का व्रत धारण किया था। एक बार वीरवती अपने ससुराल से मायके आई हुई थी। उसने करवा चौथ का निराजल व्रत रखा। सायं तक उसकी दशा देखकर उसके भाई दुखी हो उठे। भुखी बहन को देखकर सातों भाइयों ने मिलकर छल की योजना बनाई।

एक भाई ने पेड़ पर चढ़कर छलनी के पीछे दीप जला दिया तथा बोला, 'देखो, चंद्र उग आया, पारण कर लो।' बाकी भाइयों ने भी साथ दिया। वीरवती ने छल से अर्घ्य देकर भोजन किया। भोजन करते ही उसे विपत्ति का संदेश मिला, उसके पति पर संकट आ गया। दौड़ती हुई ससुराल पहुँची तो पाया कि पति की दशा गंभीर है। देवी की कृपा से उसे स्वप्न में यह ज्ञान हुआ कि उसने छल से अर्घ्य दिया था अतः व्रत अधूरा रह गया।

वीरवती ने तत्काल देवी गौरी की शरण ली, क्षमा-प्रार्थना की तथा पुनः विधिपूर्वक व्रत एवं पूजा का संकल्प किया। देवी प्रसन्न हुई और उसके पति की रक्षा हुई। इसी कथा से करवा चौथ का नियम स्थापित हुआ कि चंद्र-दर्शन एवं अर्घ्य के बाद ही पारण होता है तथा कथा-श्रवण आवश्यक है।

करवा चौथ का करवा (मिट्टी का पात्र) जल से भरकर पूजा जाता है और पूजा के उपरांत किसी देव-पात्र या ब्राह्मण को दान किया जाता है। पोथी-परंपरा में दूसरी कथा करवा नाम की सती स्त्री की है, जिसने यमराज से अपने पति की रक्षा की थी, यह कथा भाग 4 में विस्तार से दी गई है। व्रत का मूल भाव सुहाग की अक्षयता एवं पति की दीर्घायु की कामना है, निर्जल व्रत का संकल्प माता गौरी की उपासना से जुड़ा है। कथा-श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है, इसीलिए सायं बार-बार कथा-वाचन की परंपरा है।

सामान्य प्रश्न

पति की दीर्घायु, सुहाग की अक्षयता, पारिवारिक सुख एवं गौरी-कृपा।

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