
देवता
माँ गौरी (करका माता की परंपरा)
तिथि / समय
भाद्रपद/आश्विन-क्षेत्रीय परंपरा अनुसार कृष्ण चतुर्थी (हरियाणा में भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
लोक-कथा के अनुसार सास-बहू के साथ एक लड़की (पोती) ने व्रत के दिन अनजाने में पिसाई हुई अन्न देखकर व्रत तोड़ दिया था, जिससे संतान पर संकट आया था; पुनः विधिपूर्वक व्रत से संतान की रक्षा हुई थी। कथा इस प्रकार है, एक गाँव में सास-बहू-पोती तीन पीढ़ियों की स्त्रियाँ रहती थीं। चतुर्थी के दिन तीनों ने करक-चतुर्थी का व्रत रखा। दोपहर में छोटी पोती को भूख लगी। उसने चुपके से रसोई में जाकर पिसाई हुई अन्न-पिट्ठी देखी और अनजाने में उसका सेवन कर लिया, व्रत टूट गया।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
उपवास रखें (सुबह का भोजन करके दिन भर निराहार)। करका (मिट्टी के पात्र) की पूजा करें, करका चतुर्थी की कथा का श्रवण करें तथा सायं पारण करें। यह व्रत करवा चौथ के समान सुहाग-रक्षा का व्रत है, परंतु इसमें चंद्र-दर्शन का आवश्यक नियम नहीं होता, दिन में ही पारण हो जाता है (क्षेत्रीय परंपरा)। करका को जल से भरकर पूजा जाता है तथा पूजा के उपरांत वृक्ष/कुएँ में प्रवाहित करने की परंपरा भी है। सास-बहू की संयुक्त पूजा का आयोजन होता है।
पूजा सामग्री
- मिट्टी का करका (करवा-पात्र)
- कथा-पोथी
- पारण-भोजन
- सिंदूर-सुहाग सामग्री
- जल
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संतान-रक्षा, सुहाग-रक्षा एवं पारिवारिक सुख की स्थिरता।
व्रत कथा
लोक-कथा के अनुसार सास-बहू के साथ एक लड़की (पोती) ने व्रत के दिन अनजाने में पिसाई हुई अन्न देखकर व्रत तोड़ दिया था, जिससे संतान पर संकट आया था; पुनः विधिपूर्वक व्रत से संतान की रक्षा हुई थी। कथा इस प्रकार है, एक गाँव में सास-बहू-पोती तीन पीढ़ियों की स्त्रियाँ रहती थीं। चतुर्थी के दिन तीनों ने करक-चतुर्थी का व्रत रखा। दोपहर में छोटी पोती को भूख लगी। उसने चुपके से रसोई में जाकर पिसाई हुई अन्न-पिट्ठी देखी और अनजाने में उसका सेवन कर लिया, व्रत टूट गया।
उसी समय उसके घर-परिवार के बाहर से आते डोले में उसकी संतान (शिशु-भाई अथवा पुत्र प्रसंग) पर संकट का संकेत मिला। व्रत के भंग होने का यह परिणाम लोक-परंपरा के विश्वास से जुड़ा, व्रत के दिन अनाज-पिसाई देखना/गंध लेना भी वर्जित माना गया।
पोती ने दौड़कर सास-बहू को सब बताया। सास ने कहा, 'करक माता का व्रत पुनः विधि से रखो, क्षमा-प्रार्थना करो और करक की पूजा दोहराओ।' पोती ने पुनः संकल्प से व्रत-पूजा की तथा करक को जल से भरकर माता को समर्पित किया। संतान की रक्षा हुई तथा परिवार में सुख लौट आया।
इस कथा से व्रत की विशेष आज्ञाएँ जुड़ी हैं, व्रत के दिन पिसाई-अन्न का दर्शन/सेवन वर्जित, सास-बहू की संयुक्त संकल्प-शुद्धि शुभ, तथा करक-पात्र का जल-समर्पण फलदायी। व्रत का फल संतान-रक्षा एवं सुहाग-रक्षा माना गया है। यह व्रत करवा चौथ की परंपरा से गहरे जुड़ा हुआ है, दोनों में करक/करवा-पात्र की पूजा समान है, केवल तिथि एवं पारण-नियम क्षेत्रीय भेद से भिन्न हैं।
सामान्य प्रश्न
संतान-रक्षा, सुहाग-रक्षा एवं पारिवारिक सुख की स्थिरता।
