
देवता
माँ पार्वती एवं इंद्र देव (वृष्टि-परंपरा)
तिथि / समय
श्रावण कृष्ण तृतीया (भाद्रपद-परंपरा भिन्न क्षेत्रों में)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
लोक-परंपरा में कथा है कि भयंकर अकाल में स्त्रियों ने कजली गीत गाते हुए इंद्र देव की आराधना की, जिससी वर्षा हुई और अकाल टला। कथा इस प्रकार है, एक समय ऐसा आया कि वर्षा न होने से धरती बंजर हो गई तथा गाँव में अकाल का भय छा गया। कुएँ सूख गए, फसलें नष्ट हो गईं तथा पशुओं के लिए चारा तक न बचा। गाँव की स्त्रियाँ व्यथित हो गईं।
व्रत विधि
कैसे रखें
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उपवास रखें, मिट्टी के शिव-पार्वती की पूजा करें तथा कजली गीत-नृत्य (सामूहिक) का आयोजन करें। कथा का श्रवण करें तथा सायं पारण करें। नीम के पत्तों की परंपरा (कजली-व्रत का चिह्न) विशेष है, कुछ परंपराओं में सात नीम के पत्ते धारण करने का नियम है। सत्तू-गाजक के व्यंजन बनाकर बाँटें। स्त्रियाँ सामूहिक रूप से कजली गीत गाती हैं जिनमें वर्षा-मंगल एवं सौभाग्य के भाव प्रधान होते हैं।
पूजा सामग्री
- मिट्टी के शिव-पार्वती
- नीम-पत्ता (कजली-परंपरा)
- कथा-पोथी
- फूल
- सत्तू-गाजक (क्षेत्रीय व्यंजन)
- उरद-बाजरा की परंपरा
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सुहाग-रक्षा, संतान-सुख, वर्षा-मंगल एवं अकाल-नाश।
व्रत कथा
लोक-परंपरा में कथा है कि भयंकर अकाल में स्त्रियों ने कजली गीत गाते हुए इंद्र देव की आराधना की, जिससी वर्षा हुई और अकाल टला। कथा इस प्रकार है, एक समय ऐसा आया कि वर्षा न होने से धरती बंजर हो गई तथा गाँव में अकाल का भय छा गया। कुएँ सूख गए, फसलें नष्ट हो गईं तथा पशुओं के लिए चारा तक न बचा। गाँव की स्त्रियाँ व्यथित हो गईं।
तब गाँव की एक वृद्धा ने कहा, 'इंद्र देव वर्षा के स्वामी हैं। श्रावण की तृतीया को सामूहिक उपवास और कजली-गीतों से उनकी आराधना करो। गौरी-शिव की पूजा भी उसी दिन करो।' गाँव की सभी स्त्रियों ने मिलकर उस तिथि पर व्रत रखा, नीम की माला पहनी तथा आँगनों में ढोलक के साथ कजली गीत गाए, 'सुरजा देव, मेघ देव, आसाढ़ सूनो घर आयो।' उनके भाव-समूह की वाणी इंद्र तक पहुँची।
इंद्र देव प्रसन्न हुए। भीषण मेघ छिड़े तथा इतनी वर्षा हुई कि धरती हरी-भरी हो गई। गाँव में अन्न की बहुतात हो गई। तब से श्रावण कृष्ण तृतीया को कजरी तीज का व्रत प्रचलित हुआ, वर्षा-मंगल एवं सौभाग्य-रक्षा दोनों की स्मृति। तीनों तीजों (हरियाली, कजरी, हरतालिका) का वातावरण श्रावण-भाद्रपद की ऋतु-लहर से जुड़ा है, यह व्रत-त्रयी उत्तर भारत की सांस्कृतिक पहचान है।
कजरी तीज का व्रत फलदायी माना गया है, सुहाग की रक्षा, संतान-सुख तथा वर्षा-समृद्धि। कजली गीतों की परंपरा लोक-साहित्य की अनमोल धरोहर बनी, इन गीतों में स्त्री-भावना, ऋतु-वर्णन तथा प्रकृति-प्रेम का संगम मिलता है। सामूहिक व्रत-गायन से समाज में सहयोग-भाव भी बना रहता है। व्रत का निष्कर्ष यह है कि श्रद्धा-भक्ति से ऋतु-प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है।
सामान्य प्रश्न
सुहाग-रक्षा, संतान-सुख, वर्षा-मंगल एवं अकाल-नाश।
