
देवता
जीवित-पुत्रिका माता (जीमूतवाहन की माता की परंपरा)
तिथि / समय
आश्विन कृष्ण अष्टमी, रात्रि-व्रत
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
कथा के अनुसार राजा जीमूतवाहन दयावान थे; उनके पुत्र जीमूतकेतु ने गरुड़ से पकड़े गए बालक-नाग की रक्षा की थी। परंपरा की एक कथा इस प्रकार है, राजा जीमूतवाहन की माता ने संतान की दीर्घायु के लिए इस व्रत का नियम अपनाया था। नाग-कुल एवं गरुड़ के बीच संघर्ष की परंपरा से जुड़ी कथा में गरुड़ ने नाग-बालकों को पकड़कर खाना आरंभ किया था। बालक जीमूतवाहन ने गरुड़ से अपनी रक्षा-प्रार्थना से अनेक नागों की जान बचाई। गरुड़ प्रसन्न होकर बोले, 'तुम जैसा साहसी संरक्षक मैंने आज तक नहीं देखा।'
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
सप्तमी को निहोराई (साँझ की प्राथना एवं भोजन) करें। अष्टमी को दिन भर निराहार-निजला व्रत रखें, जल तक नहीं लेना होता। रात्रि म जितिया कथा का श्रवण करें तथा धतूरा की पत्ती वाली शाखा के साथ कथा-प्रतीकों की पूजा करें। रात्रि जागरण या अधिकांश स्त्रियाँ मंदिर/ आँगन में सामूहिक रूप से रात बिताती हैं। नवमी की प्रातः (उदय काल) स्नान करके जल-कलश का दान करें तथा पारण करें, बिना नमक वाला सात्विक भोजन परंपरा है। व्रत माताएँ संतान (पुत्र-पुत्री दोनों) की दीघायु के लिए रखती हैं।
पूजा सामग्री
- सिंदूर-सुहाग सामग्री
- कथा-पोथी
- पारण हेतु भोजन
- जल-कलश (अगली प्रातः)
- दूध-जल
- धतूरा-शाखा (कथा-प्रतीक)
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संतान की दीर्घायु एवं निरोग रक्षा; मातृ-साधना का फल।
व्रत कथा
कथा के अनुसार राजा जीमूतवाहन दयावान थे; उनके पुत्र जीमूतकेतु ने गरुड़ से पकड़े गए बालक-नाग की रक्षा की थी। परंपरा की एक कथा इस प्रकार है, राजा जीमूतवाहन की माता ने संतान की दीर्घायु के लिए इस व्रत का नियम अपनाया था। नाग-कुल एवं गरुड़ के बीच संघर्ष की परंपरा से जुड़ी कथा में गरुड़ ने नाग-बालकों को पकड़कर खाना आरंभ किया था। बालक जीमूतवाहन ने गरुड़ से अपनी रक्षा-प्रार्थना से अनेक नागों की जान बचाई। गरुड़ प्रसन्न होकर बोले, 'तुम जैसा साहसी संरक्षक मैंने आज तक नहीं देखा।'
मुख्य कथा सियार (गीदड़) और चिल्हारी (सियारिन) से जुड़ी है, कथा है कि एक चिल्हारी ने भी अपने बच्चों की रक्षा के लिए यह व्रत देखा। सात कुमारियाँ जंगल में व्रत की तैयारी कर रही थीं। चिल्हारी ने उनसे विधि पूछी तथा उसने भी व्रत रखने का निश्चय किया। उसके साथ एक सियार भी था। दोनों ने व्रत रखा, परंतु रात्रि में सियार ने निद्रा-वश छल करके जल पी लिया और उसने जूठन-अन्न भी छुपाकर खाया। निर्जला व्रत भंग होने से उसकी संतान पर संकट आया तथा उसे दुःख भोगना पड़ा।
चिल्हारी ने व्रत का पूर्ण पालन किया। उसकी संतान सुरक्षित रही तथा उसे माता का आशीर्वाद मिला। कथा का यही दृष्टांत निर्जला व्रत की कठोरता का उपदेश देता है, इस व्रत में जल का त्याग कठिन साधना माना गया है। धतूरा की पत्ती वाली शाखा (जिसे 'धतूरा-दही-पारण' से जोड़ा गया है) कथा का प्रतीक है, परंपरा में गरुड़-नाग कथा के साथ धतूरा-वृक्ष का संबंध जोड़ा गया है, जिसके नीचे व्रत कथा का आयोजन होता है।
व्रत का फल विशेष माना जाता है, अष्टमी की रात्रि में माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला साधना करती हैं। पारण के पहले कथा में वर्णित दृष्टांतों का स्मरण कराया जाता है ताकि व्रत का संकल्प दृढ़ हो। यह व्रत मातृ-प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा का प्रतीक बना, माँ अपनी संतान के लिए स्वयं तपती है। सामूहिक रात्रि-जागरण स्त्रियों की सामाजिक ऊर्जा का भी स्रोत बना।
सामान्य प्रश्न
संतान की दीर्घायु एवं निरोग रक्षा; मातृ-साधना का फल।
