
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
जितिया व्रत की पोथी-परंपरा में सियार (गीदड़) एवं सियारिन (गीदड़नी) की कथा प्रसिद्ध है। कथा है कि एक वर्ष आश्विन कृष्ण सप्तमी को जिमूतवाहन-परंपरा के व्रत-दिवस पर वन में सात कुमारिकाएँ जितिया-व्रत की तैयारी कर रही थीं, नहाय-धोकर, देव-पूजा का आयोजन करते हुए। उनके पास एक चिल्हारी (सियारिन) भी आ पहुँची, जिसकी संतान प्रसव होने वाली थी।
व्रत विधि
कैसे रखें
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पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
जितिया व्रत की पोथी-परंपरा में सियार (गीदड़) एवं सियारिन (गीदड़नी) की कथा प्रसिद्ध है। कथा है कि एक वर्ष आश्विन कृष्ण सप्तमी को जिमूतवाहन-परंपरा के व्रत-दिवस पर वन में सात कुमारिकाएँ जितिया-व्रत की तैयारी कर रही थीं, नहाय-धोकर, देव-पूजा का आयोजन करते हुए। उनके पास एक चिल्हारी (सियारिन) भी आ पहुँची, जिसकी संतान प्रसव होने वाली थी।
सियारिन ने कुमारिकाओं से व्रत की विधि पूछी, 'मेरी संतान की रक्षा के लिए भी कोई धर्म है क्या?' कुमारिकाओं ने निष्ठा से व्रत-विधि बताई, सप्तमी की सायं निहोराई (सात्विक भोजन), अष्टमी पर निर्जला व्रत तथा रात्रि जागरण। सियारिन ने व्रत रखा। उसके साथ एक सियार भी था। रात्रि के उत्तर-पहरे में सियार को भूख-प्यास सहन न हुई, उसने चुपके से जल पी लिया तथा मृत जीव का अन्न भी खा लिया; व्रत भंग हो गया। चिल्हारी ने धैर्य से पूरा निर्जला व्रत पूर्ण किया तथा प्रातः पारण की।
कालांतर में चिल्हारी की संतान सुरक्षित रही तथा स्वस्थ होकर जीवित रही। सियार की संतान के विषय में परंपरा यह कहती है कि उसकी संतान जन्मते ही कठिन संघर्ष की अवस्था में पड़ी, व्रत-भंग का दुःशकुन उसके जीवन पर छाया रहा। इसी कथा-प्रसंग से पोथी में दृष्टांत दिया जाता है कि व्रत की शुद्धता एवं निर्जला-निष्ठा ही उसके फल का मूल है।
कथा के साथ धतूरे का प्रसंग भी जुड़ा है, परंपरा के अनुसार व्रत-रात्रि में धतूरे की शाखा के नीचे बैठकर कथा सुनी जाती है तथा कथा में आए प्रसंगों के अनुरूप चिह्न (धतूरा-पत्ती आदि) रखे जाते हैं। जिमूतवाहन के प्रसंग के समान यह कथा भी यही उपदेश देती है, माता के त्याग-साहस एवं व्रत-निष्ठा से संतान की दीर्घायु की रक्षा होती है। जितिया के निर्जला व्रत की कठोरता इस कथा से और दृढ़ होती है, व्रत का भंग मात्र तृष्णा से ही नहीं, लापरवाही से भी नहीं होना चाहिए।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
