
देवता
श्रीकृष्ण (बालकृष्ण)
तिथि / समय
भाद्रपद (पूर्णिमान्त) कृष्ण अष्टमी, निशिकाल (मध्यरात्रि) पूजा
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
भागवत पुराण के अनुसार कंस के कारागार में बंद देवकी-वसुदेव के यहाँ मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। कंस अपने भानजे के हाथों मृत्यु का वरदान पा चुका था, इसीलिए उसने देवकी की सात संतानों का वध कर दिया था। आठवीं संतान के जन्म की रात्रि कारागार के द्वार स्वतः खुल गए, पहरेदार निद्रा में डूब गए तथा वृषभानु-नंद के घर मथुरा में ही सब कुछ देख रहे थे।
व्रत विधि
कैसे रखें
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अष्टमी के दिन उपवास रखें तथा बालकृष्ण की पूजा करें। मध्यरात्रि (निशिकाल) में कृष्ण-जन्म का अभिषेक करें, पंचामृत स्नान, शुभ्र वस्त्र, झूले पर विराजमान करना, जन्म-उत्सव की झाँकी सजाना। माखन-मिश्री का भोग लगाएँ। रात्रि-जागरण में भागवत कथा, भजन-कीर्तन तथा दही-हांडी (क्षेत्रीय) का आयोजन करें। प्रातः उपवास तोड़कर प्रसाद-वितरण करें। दही, माखन, मिश्री एवं लड्डू का प्रसाद इस पर्व की विशेष पहचान है।
पूजा सामग्री
- बालकृष्ण प्रतिमा
- झूला
- पंचामृत
- माखन-मिश्री
- फूल
- झाँकी-सामग्री
- दही-हांडी
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
मोक्ष-प्राप्ति, संतान-सुख, समृद्धि एवं भक्ति-वृद्धि; सकाम-निष्काम सभी फल प्राप्त।
व्रत कथा
भागवत पुराण के अनुसार कंस के कारागार में बंद देवकी-वसुदेव के यहाँ मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। कंस अपने भानजे के हाथों मृत्यु का वरदान पा चुका था, इसीलिए उसने देवकी की सात संतानों का वध कर दिया था। आठवीं संतान के जन्म की रात्रि कारागार के द्वार स्वतः खुल गए, पहरेदार निद्रा में डूब गए तथा वृषभानु-नंद के घर मथुरा में ही सब कुछ देख रहे थे।
कारागार में विष्णु-रूप शिशु ने वसुदेव से वत्सल स्वर में कहा कि उसे नंद-यशोदा के गोकुल ले जाया जाए तथा उनकी कन्या को यहाँ रख दिया जाए। वसुदेव ने नवजात शिशु को परात में रखकर गोकुल की ओर चलना आरंभ किया। मार्ग में यमुना नदी उफान पर थी, परंतु शिशु की दो चरण-दिशाओं से जल उस समय निवृत्त हो गया जब वसुदेव ने शिशु को देखा। गोकुल पहुँचकर वसुदेव ने नंद के घर नवजात कन्या के स्थान पर कृष्ण को रख दिया और कन्या को कारागार में लाकर रखा। कंस ने कन्या को पत्थर से मारने का प्रयत्न किया तो वह देवी महामाया रूप में प्रकट हो गई तथा उसने घोषणा की कि उसका वध करने वाला तो गोकुल में वर्तमान है। भयभीत कंस ने पुत्रनना के अनुसार आयोजन करके पुत्रनना द्वारा राज-सीमा के बाहर से आने वाले समस्त शिशुओं का वध करवा दिया।
नंद-यशोदा के घर बालकृष्ण ने बाल-लीलाएँ कीं, पूतना, शकट, तृणावर्त, वत्सासुर जैसे दैत्यों का नाश तथा गोप-गोपियों का पालन-पोषण। माखन-चोरी की लीलाओं से गोकुल भर आनंदित रहता। भक्त परंपरा में जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में शिशु-कृष्ण का अभिषेक इसी जन्म-प्रसंग की स्मृति है।
व्रत का फल भागवत परंपरा में यह बताया गया है कि जन्माष्टमी का निष्काम व्रत मोक्षदायक है। जो भक्त इस दिन उपवास एवं जागरण से रात्रि बिताते हैं, उन्हें विष्णु-लोक की प्राप्ति होती है। सकाम भक्तों की मनोकामनाएँ बालगोपाल की कृपा से पूर्ण होती हैं, संतान-सुख, समृद्धि एवं घर की रक्षा का विश्वास जन्माष्टमी से विशेष रूप से जुड़ा है।
सामान्य प्रश्न
मोक्ष-प्राप्ति, संतान-सुख, समृद्धि एवं भक्ति-वृद्धि; सकाम-निष्काम सभी फल प्राप्त।
