Aur Vrat Vrat

हरतालिका तीज कथा (गौरी-तप की विस्तृत कथा)

पद्म पुराण एवं लोक-पोथियों की परंपरा में हरतालिका तीज की कथा देवी पार्वती के पूर्व-जन्म की तपस्या से जुड़ी है। कथा है कि अपने पूर्व-जन्म में देवी ने दक्ष-पुत्री…

हरतालिका तीज कथा (गौरी-तप की विस्तृत कथा) व्रत

देवता

तिथि / समय

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

पद्म पुराण एवं लोक-पोथियों की परंपरा में हरतालिका तीज की कथा देवी पार्वती के पूर्व-जन्म की तपस्या से जुड़ी है। कथा है कि अपने पूर्व-जन्म में देवी ने दक्ष-पुत्री सती के रूप में शिव का विवाह रचाया था। दक्ष के यज्ञ में पति का अपमान देखकर सती ने योगाग्नि में शरीर त्याग दिया। इसके पश्चात उन्होंने शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए अगले जन्म में हिमालय-राज की पुत्री बनने का संकल्प लिया।

व्रत विधि

कैसे रखें

  1. 1

पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    पद्म पुराण एवं लोक-पोथियों की परंपरा में हरतालिका तीज की कथा देवी पार्वती के पूर्व-जन्म की तपस्या से जुड़ी है। कथा है कि अपने पूर्व-जन्म में देवी ने दक्ष-पुत्री सती के रूप में शिव का विवाह रचाया था। दक्ष के यज्ञ में पति का अपमान देखकर सती ने योगाग्नि में शरीर त्याग दिया। इसके पश्चात उन्होंने शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए अगले जन्म में हिमालय-राज की पुत्री बनने का संकल्प लिया।

    हिमालय के घर पार्वती उत्पन्न हुईं। बाल्यावस्था में ही उनका चित्त शिव-आराधना में लग गया। नारद जी ने आकर उन्हें समझाया कि शिव विरक्त हैं, अतः विष्णु-आदि उपयुक्त वर हो सकते हैं; हिमालय को भी विष्णु से वैवाहिक संबंध का प्रस्ताव आया। पार्वती के मन में इस संबंध ने व्याकुलता उत्पन्न की। उन्होंने अपनी सखी से कहा, 'मेरा मन बाल्यकाल से शंकर के चरणों में अर्पित है। यदि इस संबंध का निर्णय पिता कर देंगे तो मेरी भक्ति भंग होगी।'

    सखी ने उपाय बताया कि देवी गंगा-तट के एक शुभ वन में जाकर स्वयं शिव-लिंग की उपासना आरंभ करें। दोनों ने माटी से शिवलिंग रचा तथा पार्वती ने निराहार रहकर घोर तप धारण किया। ग्रीष्म में पंचाग्नि के मध्य, वर्षा में खुले आकाश के नीचे भीगती और शरद में शीतल जल में डूबी रहकर उन्होंने वर्षों तप किया। उनका शरीर क्षीण हो गया, परंतु संकल्प दृढ़ रहा। तप के तेज से समस्त भुवन में चेतना की लहर दौड़ गई।

    अंततः शिव स्वयं बाल-ब्रह्मचारी के वेश में उनके समक्ष प्रकट हुए तथा उनसे वर माँगने को कहा। पार्वती ने कहा, 'मुझे तुम्हारे समान पति चाहिए, अन्य कोई नहीं।' ब्रह्मचारी ने कहा, 'तुम तो तप कर रही हो, मैं व्रत-भंग कराने वाला हूँ; मुझे छोड़ दो।' पार्वती का मन विचलित नहीं हुआ। तब शिव ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया, त्रिशूल, मुंडमाल, अर्धचंद्र, तथा कहा, 'तुम्हारी तपस्या ने मुझे बांध लिया है; विष्णु-संबंध मैंने स्वयं निवारित किया। तुम मेरा अर्धांग बनोगी।' हिमालय की अनुमति से शिव-पार्वती का परिणय संपन्न हुआ।

    जिस तृतीया तिथि में सखी के साथ पार्वती ने यह व्रत-तप आरंभ किया था, वह भाद्रपद शुक्ल तृतीया की हरतालिका तीज के रूप में स्मरण की जाती है। सुहागिन स्त्रियाँ इस कथा के स्मरण में निर्जला व्रत रखती हैं तथा पार्वती जैसी पति-निष्ठा का संकल्प लेती हैं, इस कथा का यही अंतिम उपदेश है कि संकल्प की शक्ति के आगे नियति भी झुक जाती है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

    इस व्रत की कथा Sanatan Seva ऐप में सुनें, मंत्र और आरती के साथ

    संबंधित सामग्री

    सभी व्रतों पर वापस जाएँ