
देवता
माँ पार्वती एवं भगवान शिव
तिथि / समय
भाद्रपद शुक्ल तृतीया
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा के अनुसार माँ पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने हेतु इसी दिन अपनी सखी के साथ विधि-विधान से व्रत एवं पूजा की थी। कथा इस प्रकार है, पार्वती जी के पिता हिमालय-राज ने विष्णु से उनका विवाह कराने का निश्चय किया। पार्वती जी का मन बाल्यकाल से ही शिव पर अनुरक्त था। जब उन्हें यह समाचार नारद जी द्वारा मिला, तो उनकी सखी ने उपाय बताया।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
तृतीया के दिन निराहार (निजल) उपवास रखें। शिव-पार्वती की पूजा करें, माटी के शिव-पार्वती बनाकर स्थापना करें (क्षेत्रीय परंपरा)। बेलपत्र, सिंदूर-हल्दी अर्पित करें। रात्रि में कथा-वाचन तथा जागरण का विधान है। अगले दिन प्रातः विधिपूर्वक पारण करें। व्रती स्त्रियाँ सोलह चीज़ों का श्रृंगार करती हैं तथा सुहाग-सामग्री अर्पित करती हैं।
पूजा सामग्री
- माटी की शिव-पार्वती प्रतिमा
- सिंदूर
- हल्दी
- बेलपत्र
- फूल
- कथा-पोथी
- नारियल
- सुहाग-सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सुहाग की अक्षयता, उत्तम वर, पति-मुक्ति एवं गौरी-कृपा।
व्रत कथा
परंपरा के अनुसार माँ पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने हेतु इसी दिन अपनी सखी के साथ विधि-विधान से व्रत एवं पूजा की थी। कथा इस प्रकार है, पार्वती जी के पिता हिमालय-राज ने विष्णु से उनका विवाह कराने का निश्चय किया। पार्वती जी का मन बाल्यकाल से ही शिव पर अनुरक्त था। जब उन्हें यह समाचार नारद जी द्वारा मिला, तो उनकी सखी ने उपाय बताया।
सखी ने पार्वती जी को गंगा-तट पर ले जाकर कहा कि स्वयं बनाए स्वरूप-स्थान पर शिव के लिंग की उपासना की जाए। दोनों ने माटी से शिवलिंग बनाया तथा पार्वती जी ने निराहार रहकर घोर तप आरंभ किया, उन्होंने ऋतु-काल में सूखे पत्ते खाकर अनेक वर्षों तक शिव-ध्यान किया। शिव जी उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए तथा उनके तेज से संतुष्ट होकर बाल-ब्रह्मचारी रूप में प्रकट हुए।
ब्रह्मचारी ने पार्वती जी से वर माँगने को कहा। पार्वती जी बोलीं, 'मुझे तुम्हारे तुल्य पति चाहिए।' शिव जी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया तथा कहा, 'तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। तुम मेरे अर्धांग बनोगी।' हिमालय-राज ने भी अनुमति दे दी और इसी प्रसंग की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत प्रचलित हुआ। नाम की व्युत्पत्ति भी इसी कथा से जुड़ी मानी जाती है, 'हरि' (विष्णु) के कारण जो विवाह-संबंध से 'हर' (हरण/टाल) गया तथा 'तालिका' (सखी) के साथ जो व्रत-तप हुआ।
हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुहाग की अक्षयता की कामना से रखती हैं तथा अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर की कामना से। निर्जल व्रत इसकी विशेषता है। परंपरा का विश्वास है कि पार्वती जी के समान तप-निष्ठा से किया गया यह व्रत सुहाग को चिरस्थायी बनाता है तथा विधवा स्त्री को पुनः सुहाग की प्राप्ति कराता है। रात्रि-जागरण तथा सामूहिक कथा-गायन से माता गौरी प्रसन्न होती हैं।
सामान्य प्रश्न
सुहाग की अक्षयता, उत्तम वर, पति-मुक्ति एवं गौरी-कृपा।
