
देवता
भगवान विष्णु एवं बृहस्पति देव; क्षेत्रीय रूप में साईं बाबा
तिथि / समय
प्रत्येक गुरुवार
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
गुरुवार को विष्णु एवं बृहस्पति (गुरु ग्रह) की उपासना से ज्ञान, विवाह-सौभाग्य एवं संतान-सुख की प्राप्ति का महात्म्य परंपरा में वर्णित है। देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, विवाह-बंधन, धर्म-पालन तथा संतान-कल्याण के देता माना गया है, इसीलिए गुरुवार की उपासना से गुरु-दोष की शांति तथा इन सब सुखों की प्राप्ति होने का विश्वास रहा है।
व्रत विधि
कैसे रखें
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केले के वृक्ष, तुलसी अथवा विष्णु-प्रतिमा की पूजा करें। पीले वस्त्र पहनें तथा चने की दाल, गुड़ और केले का पीला भोग अर्पित करें। गुरुवार का उपवास अथवा एक समय भोजन का नियम रखें। विष्णु सहस्रनाम अथवा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करें तथा सायं गुरुवार व्रत कथा का श्रवण कर पारण करें। देवगुरु बृहस्पति के प्रसन्न होने की कामना से पीली वस्तुओं, चना, गुड़, हल्दी, केला, का दान करने का विधान है।
पूजा सामग्री
- पीला वस्त्र
- चने की दाल
- गुड़
- केला
- तुलसी-पत्र
- पीले पुष्प
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
ज्ञान-वृद्धि, गुरु-दोष शांति, विवाह-योग एवं संतान-सुख।
व्रत कथा
गुरुवार को विष्णु एवं बृहस्पति (गुरु ग्रह) की उपासना से ज्ञान, विवाह-सौभाग्य एवं संतान-सुख की प्राप्ति का महात्म्य परंपरा में वर्णित है। देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, विवाह-बंधन, धर्म-पालन तथा संतान-कल्याण के देता माना गया है, इसीलिए गुरुवार की उपासना से गुरु-दोष की शांति तथा इन सब सुखों की प्राप्ति होने का विश्वास रहा है।
कथा-परंपरा में एक प्रसिद्ध प्रसंग इस प्रकार आता है, एक नगर में एक धनी वणिक रहता था, परंतु उसके घर संतान-सुख नहीं था। उसने अनेक तीर्थों की यात्रा की, अनेक दान किए, परंतु मन की शांति नहीं मिली। एक बार मार्ग में उसे एक वृद्ध संत मिले, जो किसी गुरु-पीठ के आचार्य थे। वणिक ने अपना दुःख उनके सामने रखा। आचार्य ने कहा, 'संतान-सुख एवं गृह-सुख का देवता गुरु-तत्त्व है। तू नियम से प्रत्येक गुरुवार श्रीहरि के समक्ष हल्दी-रंग अर्पित कर, तुलसी के पत्ते चढ़ा और गुरु-व्रत का पालन कर। बृहस्पति देव की कृपा से गुरु-दोष का प्रभाव निवृत्त होगा।' वणिक ने यथाविध प्रत्येक गुरुवार व्रत धारण किया और विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए कथा-वाचन कराया।
कुछ ही वर्षों में उसके घर बालक ने जन्म लिया तथा व्यापार में भी ऐसी उन्नति हुई कि वह नगर का प्रतिष्ठित व्यापारी बन गया। वणिक ने अपने जीवन का शेष भाग गुरुवार-उपासना तथा दान-धर्म में लगाया और उसने प्रतिष्ठा तथा संतान-सुख दोनों का उपभोग किया।
महाराष्ट्र एवं तेलंगाना की लोक-परंपरा में गुरुवार का व्रत साईं बाबा से भी जोड़ा जाता है। शिरडी के साईं सत्चरित में भक्तों द्वारा गुरुवार को व्रत-उपवास तथा साईं दर्शन की परंपरा प्रचलित रही है। कथा-परंपरा का निष्कर्ष यह है कि गुरुवार व्रत गुरु-दोष की शांति, विवाह में विलंब का उन्मूलन, संतान-सुख, विद्या तथा धर्म-बुद्धि की वृद्धि करने वाला फलदायी व्रत है। जो स्त्री-पुरुष विधिपूर्वक पीली वस्तु अर्पित करते हैं, उनकी इच्छाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।
सामान्य प्रश्न
ज्ञान-वृद्धि, गुरु-दोष शांति, विवाह-योग एवं संतान-सुख।
