
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
भागवत पुराण के दशम स्कंध में गोवर्धन-लीला का विस्तृत वर्णन आता है, कथा है कि व्रज-प्रदेश में प्रतिवर्ष इंद्र-पूजा का भव्य आयोजन होता था। यज्ञ-वेदियाँ सजतीं, पर्वत-परिमाण व्यय का अनुष्ठान होता तथा गोप-गण इंद्र की वर्षा-कृपा की कामना से व्रत-पूजा करते थे। एक वर्ष बालकृष्ण ने नंद-बाबा से पूछा, 'पिता, यह पूजा किसकी है? इंद्र कौन हैं? वर्षा का कारण क्या है?'
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
भागवत पुराण के दशम स्कंध में गोवर्धन-लीला का विस्तृत वर्णन आता है, कथा है कि व्रज-प्रदेश में प्रतिवर्ष इंद्र-पूजा का भव्य आयोजन होता था। यज्ञ-वेदियाँ सजतीं, पर्वत-परिमाण व्यय का अनुष्ठान होता तथा गोप-गण इंद्र की वर्षा-कृपा की कामना से व्रत-पूजा करते थे। एक वर्ष बालकृष्ण ने नंद-बाबा से पूछा, 'पिता, यह पूजा किसकी है? इंद्र कौन हैं? वर्षा का कारण क्या है?'
नंद ने समझाया कि इंद्र वर्षा के देवता हैं, अतः हमारे धर्म-कर्म से उन्हें प्रसन्न करना व्रज की परंपरा है। कृष्ण ने कहा, 'इंद्र को वर्षा-देता मानकर पूजना संशय-पूर्ण है; धर्म तो स्व-कर्म की पूजा है। हम गो-पालक हैं, हमारा इंद्र गोवर्धन है, यह पर्वत हमारे भोजन की घास, हमारे पशुओं का चारा एवं हमारे जल के स्रोत देता है। हमारी देवता गायें हैं तथा ब्राह्मण-धर्म हमारा आदर है। आइए इस बार गोवर्धन-पूजा एवं गौ-पूजा करें।' नंद एवं गोप-गण कृष्ण के तर्क से अभिभूत हुए तथा उन्होंने इंद्र-यज्ञ का व्यय गोवर्धन-पूजा में लगा दिया, पर्वत की विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजा, गौ-संवत्स-पूजा तथा विप्र-भोजन हुआ।
इंद्र को ज्ञात हुआ कि यज्ञ-भाग रोक दिया गया है, उनका अहंकार जागा। उन्होंने समीरण-मेघों को आदेश दिया कि व्रज को प्रलय-वर्षा में बहा दिया जाए। भीषण मेघमाला घिर आई, बिजलियाँ चमकीं, ओलावृष्टि हुई तथा सात-आठ दिन लगातार वर्षा टिकी रही। गो-गण दुख बताने लगे, 'इंद्र का यह प्रकोप हमारे ऊपर है; हमारी गलती से यह दुर्गति हुई है।'
कृष्ण ने कहा, 'भय मत करो। इंद्र का अहंकार जान पड़ता है। यह पर्वत हमारा देवता है; यही हमारी रक्षा करेगा।' ऐसा कहकर उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपने बाएँ हाथ की अंगुली पर उठा लिया, जैसे कमल-दल को उठाते हैं। समस्त व्रज-वासी, गायें, गधे-बैल, सब पर्वत के नीचे आश्रय लेकर सुरक्षित रहे। सात दिन तक कृष्ण निराहार खड़े रहे। सातवें दिन इंद्र की मेघ-सेना थक गई। ब्रह्मा एवं शेष देवताओं के सुझाव से इंद्र को स्वयं व्रज आना पड़ा, उन्होंने गरुड़ से उतरकर कृष्ण के चरणों में शीश झुकाया, उन्हें 'गोविंद' (गौ-वृंद-इंद्र) की संज्ञा से अभिषिक्त किया तथा सूर्य-वर्षा के संतुलन का आश्वासन देकर स्वर्ग लौटे।
तब से गोवर्धन-पूजा की परंपरा चली, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन की आकृति (गोबर-मिट्टी अथवा अन्न-से) बनाकर उसे अन्नकूट-भोग (पर्वत-रूप में अनेक व्यंजन) अर्पित किए जाते हैं तथा गौ-पूजा होती है। कथा का उपदेश अमर है, अहंकार से अधिक धर्म-कर्म बड़ा है तथा प्रकृति-सेवा ही इंद्र की वास्तविक पूजा है। ब्रज-वासी गिरिराज को आज भी ठाकुर मानकर परिक्रमा करते हैं, गोवर्धन की इस अनुपम लीला की स्मृति ही अन्नकूट-पर्व है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
