
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Ganesh Chaturthi व्रत
व्रत का परिचय
शिव पुराण एवं ब्रह्मांड पुराण की परंपरा में गणेश-जन्म की कथा इस प्रकार है, कैलाश पर माता पार्वती स्नान-सौंदर्य के लिए मंदराचल-वन जाती थीं। भगवान शिव अपने गणों के साथ आकस्मिक रूप से कहीं भी प्रवेश कर लेते थे, इसीलिए माता को एक बार ऐसा अवसर आया जब उन्हें अकेले स्नान करना था तथा स्वयं के लिए द्वार-रक्षक की आवश्यकता प्रतीत हुई।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
शिव पुराण एवं ब्रह्मांड पुराण की परंपरा में गणेश-जन्म की कथा इस प्रकार है, कैलाश पर माता पार्वती स्नान-सौंदर्य के लिए मंदराचल-वन जाती थीं। भगवान शिव अपने गणों के साथ आकस्मिक रूप से कहीं भी प्रवेश कर लेते थे, इसीलिए माता को एक बार ऐसा अवसर आया जब उन्हें अकेले स्नान करना था तथा स्वयं के लिए द्वार-रक्षक की आवश्यकता प्रतीत हुई।
माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन (गंध-मेखला) को गढ़कर एक बालक का दिव्य शरीर बनाया तथा अपनी प्राण-शक्ति उसमें प्रविष्ट कर उसे पुत्र-रूप में जीवित किया। बालक अत्यंत तेजस्वी हुआ। माता ने उसे द्वार पर तैनात किया कि मेरे स्नान-पूर्ण होने तक कोई अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद भगवान शिव वहाँ आए और प्रवेश की आज्ञा चाही, बालक ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें रोक दिया।
शिव के गण, नंदी, भृंगी आदि, बालक से युद्ध करने पड़े, परंतु बालक की बाल-क्रीड़ा जैसी शक्ति ने सबको व्यथित कर दिया। आखिर में भगवान शिव ने स्वयं क्रोध में त्रिशूल चलाया और बालक का शिर धड़ से पृथक हो गया। माता पार्वती ने जब यह देखा तो उनका तप-तेज भभक उठा, उन्होंने कहा कि वत्स को जीवित कराया नहीं जाएगा तो सृष्टि का संहार हो जाएगा। ब्रह्मा आदि देवता शांत करने आए।
शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया कि उत्तर दिशा की ओर जाकर प्रथम मिलने वाले प्राणी का शिर लाया जाए। गणों को उत्तर दिशा में प्रथम एक मातंग-शावक (हाथी का बच्चा) मिला; उसका शिर लाकर बालक के धड़ पर योजित किया गया। शिव जी ने प्राण-प्रतिष्ठा की तथा उसे अपना पुत्र स्वीकार करते हुए घोषणा की, 'यह गणों का अधिपति गणपति होगा; किसी भी शुभ-कार्य की आरंभ-पूजा इसी की होगी।' ब्रह्मा आदि देवों ने आशीर्वाद दिया तथा बालक की पूजा की।
परंपरा में चतुर्थी के दिन चंद्र-दर्शन का त्याग भी इसी कथा से जुड़ा है, एक प्रसंग के अनुसार चंद्रमा ने गणेश के मोटे शरीर पर हँसी उड़ाई थी, जिससे उसे शाप मिला था (यह प्रसंग संकष्टी चतुर्थी से विस्तार से जुड़ा है, प्रविष्टि संख्या 12 देखें)। गणेश चतुर्थी की विधिपूर्ण पूजा से विघ्न-नाश, बुद्धि-वृद्धि तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है, मोदक-भोग एवं दूर्वा-अर्पण का विशेष विधान इसी कथा-परंपरा से जुड़ा है। दस-दिवसीय गणेशोत्सव तथा अनंत चतुर्दशी पर विधिपूर्वक विसर्जन का आयोजन पुनः-आगमन की प्रार्थना (पुनः वर्षोपरोत्तत्) के साथ किया जाता है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
