
देवता
श्री गणेश जी
तिथि / समय
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (दिन का पूजन मान्य)
श्रेणी
Ganesh Chaturthi व्रत
व्रत का परिचय
शिव पुराण/मुद्गल पुराण की कथा के अनुसार माँ पार्वती ने स्नान के समय सुरक्षा हेतु उबटन से गणेश की रचना की थी। कथा इस प्रकार है, मंदराचल पर माता पार्वती नित्य स्नान के लिए जाती थीं। एक बार उन्होंने अपने देह-उबटन को गढ़कर एक बालक का शरीर बनाया तथा अपनी प्राण-शक्ति उसमें प्रविष्ट कर दी। बालक अद्भुत तेज का धनी हो गया। माता ने उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया कि कोई भी अंदर न आने पाए, जब तक वे स्नान समाप्त न कर लें।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
प्रातः स्नान के बाद गणेश प्रतिमा स्थापना (प्राणप्रतिष्ठा) करें। षोडशोपचार पूजा करें, इक्कीस दूर्वा (तिन-पत्ती वाली) अर्पित करें, मोदक-लड का भोग लगाएँ तथा गणेश चतुर्थी की कथा का वाचन करें। उपवास अथवा फलाहार रखें। अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन) तक दस दिन पूजा की जाती है तथा उसके बाद विधिपूर्वक विसर्जन करें। दूर्वा, मोदक एवं लाल पुष्प इस पूजा के विशिष्ट अंग हैं।
पूजा सामग्री
- गणेश प्रतिमा (मिट्टी)
- दूर्वा
- मोदक
- लाल पुष्प
- अक्षत
- चंदन
- नारियल
- विसर्जन हेतु कलश-जल
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
विघ्न-नाश, विद्या-बुद्धि की वृद्धि, सौभाग्य एवं कार्य-सिद्धि।
व्रत कथा
शिव पुराण/मुद्गल पुराण की कथा के अनुसार माँ पार्वती ने स्नान के समय सुरक्षा हेतु उबटन से गणेश की रचना की थी। कथा इस प्रकार है, मंदराचल पर माता पार्वती नित्य स्नान के लिए जाती थीं। एक बार उन्होंने अपने देह-उबटन को गढ़कर एक बालक का शरीर बनाया तथा अपनी प्राण-शक्ति उसमें प्रविष्ट कर दी। बालक अद्भुत तेज का धनी हो गया। माता ने उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया कि कोई भी अंदर न आने पाए, जब तक वे स्नान समाप्त न कर लें।
थोड़ी ही देर में भगवान शिव आए और द्वार पर प्रवेश की आज्ञा चाही। बालक ने माता की आज्ञा के अनुसार रोक दिया। शिव-गणों तथा नंदी आदि के प्रयत्न भी असफल रहे, बालक की शक्ति उन्हें भी दिख गई। अंत में क्रोधित शिव ने अपना त्रिशूल चलाया और बालक का शिर धड़ से अलग कर दिया। पार्वती जी ने बाहर आकर देखा तो उनका क्रोध सीमा से बाहर हो गया। उन्होंने कहा, 'तुम्हारे तेज से यह वत्स बचा कराओ, अन्यथा त्रिलोक में उत्पात होगा।'
शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में पहले मिलने वाले प्राणी का शिर लाया जाए। गणों को उत्तर की ओर सबसे पहले एक हाथी मिला; उसका शिर लाकर बालक के धड़ पर जोड़ा गया। शिव जी ने प्राण-प्रतिष्ठा की तथा उसे अपना पुत्र स्वीकार किया और यह वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य की आरंभ-पूजा इसी की होगी, यही विघ्नहर्ता स्वरूप बना। ब्रह्मा आदि देवताओं ने उसे गणों का ईश (गणपति) स्वीकार किया।
चतुर्थी के दिन चंद्र-दर्शन का त्याग भी इसी कथा-परंपरा से जुड़ा है। परंपरा का विश्वास है कि इस दिन चंद्र का देखना अशुभ है, क्योंकि चंद्रमा ने ही गणेश जी की उपासना में चतुर्थी के दिन उपेक्षा की थी तथा उसे शाप मिला था। गणेश चतुर्थी की पूजा से विद्या, बुद्धि, सौभाग्य तथा कार्य-सिद्धि की प्राप्ति होती है, मोदक-भोग से गणपति की इच्छा के अनुसार उनकी संतुष्टि सर्वाधिक होती है। दस-दिवसीय उत्सव के उपरांत विसर्जन के समय गणेश जी के पुनः आगमन की प्रार्थना 'पुनः वर्षोपरोत्तत्' के मंत्र से की जाती है।
सामान्य प्रश्न
विघ्न-नाश, विद्या-बुद्धि की वृद्धि, सौभाग्य एवं कार्य-सिद्धि।
