Aur Vrat Vrat

गणगौर

राजस्थानी परंपरा की कथा में ईशान नाम का शिवभक्त वनवासी था; गौरी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसे वर दिया। कथा इस प्रकार है, ईशान नाम का एक वनवासी शिव-उपासक था।…

गणगौर व्रत

देवता

माँ गौरी एवं ईशान (शिव)

तिथि / समय

चैत्र शुक्ल तृतीया से दस दिन तक

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

राजस्थानी परंपरा की कथा में ईशान नाम का शिवभक्त वनवासी था; गौरी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसे वर दिया। कथा इस प्रकार है, ईशान नाम का एक वनवासी शिव-उपासक था। उसकी वाणी निर्मल थी तथा वह गौरी-शंकर की सेवा में सदा तत्पर रहता था। एक बार उसके गाँव में दुर्भिक्ष पड़ा। भूख से व्याकुल लोग ईशान के पास आए तथा उन्होंने सेवा-मार्ग से गौरी की कृपा माँगी। ईशान के नेतृत्व में गाँव की स्त्रियों ने माटी की गौरी बनाकर पूजा आरंभ की तथा दस दिनों तक गीत-स्तुति करती रहीं।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    तृतीया से दस दिनों तक, घुमार (माटी की गौरी-प्रतिमा) की स्थापना करें। प्रतिदिन पूजा-गीत (घिन्नी) गाएँ, सुहाग-सामग्री अर्पित करें तथा कन्याओं को भोजन-दान दें। अंतिम दिन (चैत्र शुक्ल चतुर्दशी/अमावस्या पर्यंत परंपरा भिन्न) विसर्जन की शोभायात्रा निकालें। सामूहिक गीत- नृत्य एवं ढोलक-वाद्य के साथ घर-घर पूजा की जाती है। कुमारिकाएँ उत्तम वर के लिए तथा सुहागिन स्त्रियाँ सुहाग की रक्षा के लिए व्रत रखती हैं।

पूजा सामग्री

  • घुमार/गौरिया (माटी की गौरी प्रतिमा)
  • जौ-गेहूँ
  • फूल
  • सुहाग-सामग्री
  • गीत-ढोलक (सामूहिक)
  • पिसी-मिठाई (परंपरा)

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

सुयोग्य वर, अक्षय सुहाग, गाँव-घर का कल्याण एवं सामाजिक एकता।

व्रत कथा

राजस्थानी परंपरा की कथा में ईशान नाम का शिवभक्त वनवासी था; गौरी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसे वर दिया। कथा इस प्रकार है, ईशान नाम का एक वनवासी शिव-उपासक था। उसकी वाणी निर्मल थी तथा वह गौरी-शंकर की सेवा में सदा तत्पर रहता था। एक बार उसके गाँव में दुर्भिक्ष पड़ा। भूख से व्याकुल लोग ईशान के पास आए तथा उन्होंने सेवा-मार्ग से गौरी की कृपा माँगी। ईशान के नेतृत्व में गाँव की स्त्रियों ने माटी की गौरी बनाकर पूजा आरंभ की तथा दस दिनों तक गीत-स्तुति करती रहीं।

दसवें दिन गौरी देवी प्रसन्न हुईं। उन्होंने गाँव में अन्न-जल की व्यवस्था कराई तथा सभी स्त्रियों को सुहाग का आशीर्वाद दिया, अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर का वरदान मिला तथा सुहागिनों को चिरस्थायी सुहाग की प्राप्ति हुई। ईशान को गौरी का अनन्य भक्त होने का गौरव मिला, उसी के नाम पर पर्व 'गणगौर' (गण अर्थात ईशान-गौर का संयुक्त आश्रय) जुड़ा माना गया।

कथा का लोक-भाव यह है कि गौरी की सामूहिक उपासना से गाँव-घर का कल्याण होता है। घिन्नी-गीतों में गौरी के विवाह-प्रसंग का गायन होता है तथा 'सुहाग' की अक्षयता का संकेत दिया जाता है। विसर्जन-शोभायात्रा में गौरी को शंकर के घर विदा करने का अनुष्ठान होता है, यह पुत्री-विदाई की स्मृति से भी जुड़ा है।

व्रत का फल परंपरा में यह माना गया है कि गणगौर की पूजा से अविवाहित कन्या को सुयोग्य वर, सुहागिन को अक्षय सुहाग तथा विधवा को पुनर्विवाह-योग एवं मोक्ष-मार्ग की प्राप्ति होती है। मेवाड़-मारवाड़ की यह परंपरा अब संपूर्ण उत्तर-पश्चिम भारत में प्रचलित है। सामूहिक उत्सव के माध्यम से यह पर्व समाज में उत्सव-बंधुत्व का संदेश भी देता है, घर-घर की स्त्रियाँ मिलकर गौरी की साधना करती हैं।

सामान्य प्रश्न

सुयोग्य वर, अक्षय सुहाग, गाँव-घर का कल्याण एवं सामाजिक एकता।

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