
देवता
तिथि / समय
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
भागवत पुराण के आठवें स्कंध में गजेन्द्र-मोक्ष का वर्णन आता है, कथा है कि त्रिकूट नामक पर्वत के समीप एक सरोवर था, जिसमें कमल-मंदार से सुशोभित जल था। सरोवर में गजराज (हाथियों का सम्राट) अपनी गज-परिवार के साथ विचरण करता था। उस गजराज के पूर्व-जन्म में एक राजा था, इन्द्रद्युम्न नाम के पांड्य-राज, जो विष्णु-भक्त थे। देवर्षि अगस्त्य के शाप-प्रभाव से उन्हें हाथी का जन्म मिला था, परंपरा कहती है कि भक्ति-स्मृति उनके साथ बनी रही।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।
व्रत कथा
भागवत पुराण के आठवें स्कंध में गजेन्द्र-मोक्ष का वर्णन आता है, कथा है कि त्रिकूट नामक पर्वत के समीप एक सरोवर था, जिसमें कमल-मंदार से सुशोभित जल था। सरोवर में गजराज (हाथियों का सम्राट) अपनी गज-परिवार के साथ विचरण करता था। उस गजराज के पूर्व-जन्म में एक राजा था, इन्द्रद्युम्न नाम के पांड्य-राज, जो विष्णु-भक्त थे। देवर्षि अगस्त्य के शाप-प्रभाव से उन्हें हाथी का जन्म मिला था, परंपरा कहती है कि भक्ति-स्मृति उनके साथ बनी रही।
एक दिन गजराज सरोवर में जल-क्रीड़ा कर रहा था। उसी सरोवर में एक मगर (हुहु नाम का ग्राह) रहता था, पूर्व-जन्म में एक गंधर्व-राज जिसे ऋषि-शाप से मगर-योनि मिली थी। मगर ने गजराज के पाँव को दाँतों से पकड़ लिया तथा उसे जल-गहन में खींचने लगा। गजराज ने अपनी समस्त शक्ति लगा दी, गज-समूह ने भी प्रयत्न किया, परंतु मगर की पकड़ न छूटी। हज़ारों वर्ष इसी संघर्ष में व्यतीत हुए, देह शिथिल हो गई, रक्त-जल मिलने लगा तथा गजराज की प्राण-शक्ति क्षीण हो गई।
अंतिम क्षण में गजराज ने समस्त गज-भाव त्यागकर कमल का एक पुष्प अपनी सूँड से उखाड़ा तथा उसे हृदय-भाव से श्रीहरि के चरणों में अर्पित करते हुए शरणागति-भाव से प्रार्थना की, उसने ईश्वर का स्मरण वैदिक ऋचाओं के रूप में किया तथा विष्णु को परब्रह्म सिद्ध करते हुए उनकी शरण माँगी। यह शरणागति, स्व-बल का पूर्ण त्याग, उसके मोक्ष का द्वार बनी।
वैकुंठ में श्रीहरि के एक दिव्य-स्पर्श से गजराज की पुकार पहुँची। वे तत्क्षण गरुड़ पर स्वयं सरोवर-पार उतरे, द्वार पर पहुँचकर सुदर्शन-चक्र से उस मगर का शिर धड़ से अलग कर दिया तथा गजराज को दृष्टि दी। उस क्षण मगर से गंधर्व-देह निकली तथा वह स्वर्ग को गया; गजराज से भी शाप-देह छूट गई तथा उसे सांख्य-योग-तत्त्व दर्शाकर भगवान ने उसे अपने साथ वैकुंठ का अधिकारी बना लिया।
गजेन्द्र-मोक्ष का उपदेश अत्यंत प्रभावशाली है, जिस क्षण जीव अपना स्व-अहं त्यागकर पूर्ण शरणागति से ईश्वर को पुकारता है, उसी क्षण ईश्वर साधन-संदेह छोड़कर स्वयं दौड़े चले आते हैं। यह कथा भक्तों द्वारा नित्य पाठ की जाती है, संकट-पीड़ित जीव को शरणागति का मार्ग दिखाने वाली यह कथा विष्णु-परंपरा का सर्वोत्कृष्ट दिव्य-प्रसंग मानी जाती है।
सामान्य प्रश्न
श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
