देवता
भगवान विष्णु
तिथि / समय
प्रत्येक पक्ष की एकादशी, वर्ष में 24 बार
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
पद्म पुराण के अनुसार युधिष्ठिर के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ने एकादशी का माहात्म्य बताया। कथा के अनुसार मुर नाम का एक महाबली दैत्य अपने अनुचरों सहित देवलोक पर आक्रमण करने लगा था। मुर का निवास समुद्र में स्थित एक सुरक्षित दुर्ग में था। उसके आतंक से देवता व्यथित होकर श्रीहरि की शरण में गए। भगवान विष्णु ने गदा पकड़कर मुर के दुर्ग का नाश किया और दैत्य-सेना का संहार किया। अंत में मुर से युद्ध हुआ। मुर रस-विद्या से अनेक रूप धारण करता तथा घायल होकर भी पुनः सेना की तरह खड़ा हो जाता था।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
दशमी को सायं से एक समय सात्विक भोजन करें तथा ब्रह्मचय-त्याग का संकल्प लें। एकादशी को निराहार अथवा फलाहार रहें, विष्णु-पूजा एवं तुलसी अर्पण करें तथा रात्रि जागरण एवं भजन-कीर्तन करें। द्वादशी को दान-पुण्य के पश्चात् पारण करें। एकादशी के दिन अन्न, चावल, दाल एवं हिंसा-युक्त भोजन का त्याग आवश्यक माना गया है। नीचे वार्षिक 24 एकादशियों की सूची दी गई है; उत्तर भारत के पूर्णिमान्त पंचांग में नाम-भेद पारंपरिक रूप से मिलता है।
पूजा सामग्री
- पंचामृत
- तुलसी
- पीले फूल
- फल
- श्रीखंड-चंदन
- विष्णु चित्र/शालग्राम
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
समस्त पापों का नाश, विष्णु-प्रसन्नता, वैकुंठ-प्राप्ति की परंपरा।
व्रत कथा
पद्म पुराण के अनुसार युधिष्ठिर के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ने एकादशी का माहात्म्य बताया। कथा के अनुसार मुर नाम का एक महाबली दैत्य अपने अनुचरों सहित देवलोक पर आक्रमण करने लगा था। मुर का निवास समुद्र में स्थित एक सुरक्षित दुर्ग में था। उसके आतंक से देवता व्यथित होकर श्रीहरि की शरण में गए। भगवान विष्णु ने गदा पकड़कर मुर के दुर्ग का नाश किया और दैत्य-सेना का संहार किया। अंत में मुर से युद्ध हुआ। मुर रस-विद्या से अनेक रूप धारण करता तथा घायल होकर भी पुनः सेना की तरह खड़ा हो जाता था।
भगवान विष्णु ने युद्ध के उपरांत एक गुफा में विश्राम के हेतु से योग-निद्रा धारण की। मुर उसी गुफा में प्रवेश करके भगवान पर आक्रमण करने को उद्यत हुआ। उसी क्षण भगवान के तन से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई, जो अमोघ शक्ति से संपन्न थी। उस कन्या ने मुर को भस्म कर दिया। प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उस कन्या को 'एकादशी' नाम दिया और कहा, 'तू मेरे प्रिय हरिवासर से उत्पन्न हुई है; आगे तू कलियुग में मेरे भक्तों के सर्वपाप नष्ट करने वाली व्रत-स्वरूपिणी बनेगी। जो एकादशी को विधिपूर्वक मेरी उपासना करेगा, उसके समस्त पाप दग्ध हो जाएँगे और उसे वैकुंठ की प्राप्ति होगी।'
इस प्रकार एकादशी व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय व्रत माना गया है। परंपरा में इसे समस्त व्रतों का शिरोमणि एवं चारों युगों में फलदायी बताया गया है। निर्जला एकादशी को छोड़कर शेष एकादशियों में फलाहार की छूट है, पर अन्न का त्याग अनिवार्य समझा जाता है, कथा-परंपरा में एकादशी तिथि को हरि स्वयं अन्न-रूप में व्याप्त रहते हैं, इसीलिए अन्न-भक्षण तिथि का अनादर माना गया है। एकादशी की रात्रि जागरण एवं द्वादशी के दिन ब्राह्मण-भोजन एवं दान से व्रत का पूर्ण फल मिलता है। वर्ष की 24 एकादशियाँ भाग 2 में विस्तार से कथा सहित दी गई हैं।
सामान्य प्रश्न
समस्त पापों का नाश, विष्णु-प्रसन्नता, वैकुंठ-प्राप्ति की परंपरा।
