
देवता
माँ महागौरी / माँ चामुंडा
तिथि / समय
आश्विन शुक्ल अष्टमी (शारदीय नवरात्रि में)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
कथा-परंपरा में अष्टमी के दिन देवी चामुंडा ने रक्तबीज दानव का संहार किया था, जिसके प्रत्येक रक्त-बिंदु से नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। दुर्गा सप्तशती के अनुसार शुंभ-निशुंभ दैत्यों की सेना में चंड-मुंड तथा रक्तबीज नाम के दैत्य थे। देवी चामुंडा (काली स्वरूप) ने चंड-मुंड का वध किया तथा रक्तबीज से युद्ध किया।
व्रत विधि
कैसे रखें
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अष्टमी के दिन उपवास रखें, देवी पूजा एवं हवन करें। नौ कन्याओं (दो से दस वर्ष तक की बालिकाओं) का पूजन-भोजन (कुमारिका पूजन) करें, उन्हें हलवा, पूरी, काले चने एवं उपहार दें। कन्याओं को देवी-रूप मानकर उनके चरण धोकर सम्मान देने की परंपरा है। अष्टमी की पूजा के उपरांत बलि-पूजा अथवा दान का विधान क्षेत्रीय रूप से मिलता है।
पूजा सामग्री
- नौ कन्याओं हेतु भोजन
- हलवा-पूरी-काले चने
- हवन-सामग्री
- देवी चित्र
- लाल वस्त्र
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संतान-सुख, सौभाग्य-रक्षा, रोग-शोक नाश एवं देवी-कृपा।
व्रत कथा
कथा-परंपरा में अष्टमी के दिन देवी चामुंडा ने रक्तबीज दानव का संहार किया था, जिसके प्रत्येक रक्त-बिंदु से नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। दुर्गा सप्तशती के अनुसार शुंभ-निशुंभ दैत्यों की सेना में चंड-मुंड तथा रक्तबीज नाम के दैत्य थे। देवी चामुंडा (काली स्वरूप) ने चंड-मुंड का वध किया तथा रक्तबीज से युद्ध किया।
रक्तबीज की शक्ति यह थी कि जब उसका रक्त धरती पर गिरता, तो प्रत्येक बिंदु से उतना ही बलवान नया रक्तबीज खड़ा हो जाता था। युद्ध में देवी के शस्त्रों से घायल होकर रक्तबीज के असंख्य रूप पैदा हो गए और देव-सेना देखते-देखते दैत्य-समुद्र में घिर गई। तब देवी चामुंडा ने अपना विशाल स्वरूप धारण किया तथा रक्तबीज का रक्त पृथ्वी पर गिरने से पूर्व ही उसकी जिह्वा से चटकर पी लेती गईं। इस प्रकार उसका रक्त बिंदु-बिंदु सूखता गया और देवी ने उसका वध कर दिया।
इस विजय की स्मृति में अष्टमी की पूजा का महत्त्व बताया गया। महागौरी स्वरूप की उपासना भी इसी दिन की जाती है, जो श्वेत वस्त्र-विभूषित, शांत एवं करुणामयी स्वरूप है। परंपरा का विश्वास है कि अष्टमी पर कन्या-पूजन से देवी के नौ स्वरूपों की सम्मिलित आराधना हो जाती है, क्योंकि बालिकाएँ देवी की शुद्ध शक्ति के प्रतीक मानी गई हैं।
व्रत का फल परंपरा में यह बताया गया है कि दुर्गाष्टमी के व्रत-पूजन से संतान सुख, सौभाग्य की अक्षयता तथा रोग-शोक का नाश होता है। जो गृहस्थ इस दिन विधिपूर्वक कन्या-भोजन कराते हैं, उनके घर की समृद्धि अक्षय रहती है। यह व्रत मातृ-शक्ति की आराधना का लोक-प्रतीक बन गया है।
सामान्य प्रश्न
संतान-सुख, सौभाग्य-रक्षा, रोग-शोक नाश एवं देवी-कृपा।
