Aur Vrat Vrat

ध्रुव-कथा (ध्रुव-पद प्राप्ति)

भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में ध्रुव-चरित वर्णित है, कथा है कि उत्तानपाद नाम के राजा की दो पत्नियाँ थीं, सुनीति एवं सुरुचि। सुरुचि प्रिया थी; उत्तम पुत्र उत्तम…

ध्रुव-कथा (ध्रुव-पद प्राप्ति) व्रत

देवता

तिथि / समय

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Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में ध्रुव-चरित वर्णित है, कथा है कि उत्तानपाद नाम के राजा की दो पत्नियाँ थीं, सुनीति एवं सुरुचि। सुरुचि प्रिया थी; उत्तम पुत्र उत्तम को राजा की गोद में बैठाया जाता था। एक दिन पाँच वर्ष का बालक ध्रुव (सुनीति-पुत्र) भी पिता की गोद में बैठने को उद्यत हुआ। सुरुचि ने रोक दिया तथा कहा, 'यह गोद उत्तम के लिए है; यदि तुझे राजा का पुत्र होने का अधिकार चाहिए तो किसी अन्य जन्म में मेरे गर्भ से जन्म ले। वर तो वही बनता है जिसे तप से विष्णु-प्राप्ति हो।'

व्रत विधि

कैसे रखें

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पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में ध्रुव-चरित वर्णित है, कथा है कि उत्तानपाद नाम के राजा की दो पत्नियाँ थीं, सुनीति एवं सुरुचि। सुरुचि प्रिया थी; उत्तम पुत्र उत्तम को राजा की गोद में बैठाया जाता था। एक दिन पाँच वर्ष का बालक ध्रुव (सुनीति-पुत्र) भी पिता की गोद में बैठने को उद्यत हुआ। सुरुचि ने रोक दिया तथा कहा, 'यह गोद उत्तम के लिए है; यदि तुझे राजा का पुत्र होने का अधिकार चाहिए तो किसी अन्य जन्म में मेरे गर्भ से जन्म ले। वर तो वही बनता है जिसे तप से विष्णु-प्राप्ति हो।'

    बालक ध्रुव के मन पर इस वाणी का गहरा प्रभाव पड़ा। सुनीति ने सांत्वना दिया, 'पुत्र, अपमान-वाणी का उत्तर साधना से दिया जाता है। श्रीहरि की आराधना करो; वे ही सब देते हैं।' ध्रुव ने राज-भोग का संकल्प त्यागकर वन की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में देवर्षि नारद मिले तथा उन्होंने बालक की दिशा संस्कृत करते हुए विष्णु-मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) दीक्षा दी तथा मधुवन में तप का निर्देश दिया।

    पाँच वर्ष का बालक उसी स्थान पर घोर तप में लीन हो गया, पहले माह में फल-मूल खाकर, दूसरे में पत्ते, तीसरे में जल, चौथे में वायु ग्रहण करके तथा पाँचवें माह में पूर्ण निराहार होकर सांख्य-योग में स्थित रहा। उसके तप से समस्त भुवन में उत्तर-दिशा का संतुलन अटल हो गया; त्रिलोक में तप की अद्भुत कथा फैल गई।

    अंततः श्रीहरि प्रसन्न हुए तथा उन्होंने बालक को चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए। विष्णु ने वर माँगने को कहा। ध्रुव ने तप-पूर्ण वाणी में केवल यह अभिलाषा प्रकट की कि उनके चरण-स्मरण उनके चित्त में सदा बना रहे। भगवान ने उसे स्थिर-तेज एवं सात ऋषियों के समीप विराजमान 'ध्रुव-पद', तारों का अक्ष-केंद्र, का अभिषेक किया तथा अंतिम विष्णु-लोक का वरदान भी दिया। ध्रुव अपने शरीर के साथ ध्रुव-तारे के रूप में स्थापित हो गए, जिन ऋषियों का श्राप या दृष्टि इस संसार के लिए दिशा-सूचक बना।

    कथा का उपदेश अमर है, अपमान साधना का स्रोत बन सकता है; आयु तप की अड़चन नहीं है; तथा विष्णु-भक्ति में संकल्प की शक्ति सबसे बड़ी है। ध्रुव को स्मरण करने वाले भक्त जीवन की दिशा (दिशा-निर्णय) में स्थिरता पाते हैं, यह परंपरा का विश्वास है। बाल-साधक की यह कथा संतति-भक्ति की परंपरा में विशेष प्रेरणा देती है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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