Aur Vrat Vrat

देवी महिषासुरमर्दिनी की विस्तृत कथा

मार्कंडेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी-माहात्म्य) में देवी के प्राकट्य एवं महिषासुर-वध का वर्णन है, कथा है कि महिषासुर नाम का दैत्य घोर तप करके ब्रह्मा जी से व…

देवी महिषासुरमर्दिनी की विस्तृत कथा व्रत

देवता

तिथि / समय

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

मार्कंडेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी-माहात्म्य) में देवी के प्राकट्य एवं महिषासुर-वध का वर्णन है, कथा है कि महिषासुर नाम का दैत्य घोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान पाया कि उसका वध स्त्री-द्वारा संभव न हो। वर के अहंकार से उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, देवताओं को अपनी आज्ञा का पालन करने के लिए विवश किया तथा ऋतु-व्यवस्था तक बिगाड़ दी। देवता त्राहि-त्राहि करते हुए ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की शरण में गए।

व्रत विधि

कैसे रखें

  1. 1

पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    पराणा व्रत समाप्ति के बाद नियमानुसार करें।

    व्रत कथा

    मार्कंडेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी-माहात्म्य) में देवी के प्राकट्य एवं महिषासुर-वध का वर्णन है, कथा है कि महिषासुर नाम का दैत्य घोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान पाया कि उसका वध स्त्री-द्वारा संभव न हो। वर के अहंकार से उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, देवताओं को अपनी आज्ञा का पालन करने के लिए विवश किया तथा ऋतु-व्यवस्था तक बिगाड़ दी। देवता त्राहि-त्राहि करते हुए ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की शरण में गए।

    तीनों महादेवों की वाणी से उनके कोप-तेज प्रकट हुआ; समस्त देवताओं के देह-तेज एक होकर एक विशाल तेज-पिंड बन गया और उसी तेज से अद्भुत देवी-मूर्ति प्रकट हुई, शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र एवं शंख, इंद्र का वज्र, यम का काल-दंड, ब्रह्मा का कमंडल, सूर्य का तेज, वायु का धनुष, वरुण का पाश, समुद्र का हार-कुंडल-वस्त्र, विश्वकर्मा के आभूषण तथा हिमालय का सिंह, सब अंश देवी को समर्पित हुए। देवी ने अपनी दिव्य विभूति से समस्त देवताओं को आश्वस्त किया।

    देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर के दुर्ग की ओर बढ़ीं। उनके सिंह की गर्जना से समस्त भुवन काँप उठे। दैत्य-सेना के समूह आक्रमण करते रहे, चिकुर, चामर, उद्र, उलूक, असुर-योद्धा, देवी ने एक-एक का विनाश किया। महिषासुर के प्रधान सेनापतियों, चंड, मुंड, रक्तबीज, भी चंडी-स्वरूप से नष्ट हुए (रक्तबीज का संहार चामुंडा ने उसका रक्त पीकर किया)।

    अंत में महिषासुर स्वयं महा-माया-रूप धारण करके युद्ध में उतरा। भीषण युद्ध हुआ, महिष रूप (भैंसा) धारण करके वह धरती खोदता, पर्वत उछालता तथा अपनी भुजाओं से देवी के बाण-वृष्टि को निष्फल करता। देवी ने महिष का शिर उछाला, वह पुनः मानव-रूप में आकर देवी पर टूट पड़ा, तब देवी ने उसे निःश्वास-क्रोड से जकड़कर त्रिशूल से विद्ध कर दिया तथा शिर-विच्छेदन से उसका अंत कर दिया। समस्त देवताओं ने 'जय महिषासुरमर्दिनी' की ध्वनि से त्रिलोक गुंजा दिया तथा स्तुति-वर्षा की।

    देवी ने भक्तों को वरदान दिया कि जो उनकी इस विजय-कथा का श्रवण-पाठ करेगा, उसे संकट, रोग एवं शत्रु-भय कभी स्पर्श नहीं करेंगे। नवरात्रि के नौ दिन इसी विजय की स्मृति में शक्ति-उपासना होती है, देवी के नौ स्वरूपों की आराधना से साधक शक्ति, सिद्धि एवं कल्याण का अधिकारी बनता है। कथा का सार यह है कि अहंकार-वर से अजेय दुष्ट भी शक्ति-संयम से मिली दिव्य-नारी-स्वरूप के समक्ष निष्प्रभ निश्चित है, धर्म की विजय अटल है।

    सामान्य प्रश्न

    श्रद्धा और नियम के साथ किए गए व्रत से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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