Ekadashi Vrat

देवशयनी / हरिशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी का महात्म्य वामन-बलि प्रसंग से जुड़ा है। कथा है कि दैत्य-राज बलि ने घोर तप के बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवता विष्णु की शरण में गए।…

देवशयनी / हरिशयनी एकादशी व्रत

देवता

भगवान विष्णु

तिथि / समय

आषाढ़ शुक्ल एकादशी

श्रेणी

Ekadashi व्रत

व्रत का परिचय

देवशयनी एकादशी का महात्म्य वामन-बलि प्रसंग से जुड़ा है। कथा है कि दैत्य-राज बलि ने घोर तप के बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवता विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने वामन (बौना ब्रह्मचारी) रूप धारण किया तथा बलि के यज्ञ में जाकर तीन पग भूमि माँगी। बलि ने दान दिया। वामन ने पहले पग में धरती, दूसरे पग में आकाश ले लिया; तीसरे पग के लिए बलि ने अपना शिर अर्पित किया। वामन ने उसका शिर दबाकर उसे सुतल लोक का राज्य दिया तथा वरदान दिया कि वे स्वयं उसके राज्य में द्वार-पाल बनकर रहेंगे।

व्रत विधि

कैसे रखें

  1. 1

पूजा सामग्री

    व्रत के नियम

    • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
    • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

    पारण विधि

    चातुर्मास आरंभ, विष्णु शयन; शुभ कार्यों का विराम

    व्रत कथा

    देवशयनी एकादशी का महात्म्य वामन-बलि प्रसंग से जुड़ा है। कथा है कि दैत्य-राज बलि ने घोर तप के बल से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवता विष्णु की शरण में गए। भगवान विष्णु ने वामन (बौना ब्रह्मचारी) रूप धारण किया तथा बलि के यज्ञ में जाकर तीन पग भूमि माँगी। बलि ने दान दिया। वामन ने पहले पग में धरती, दूसरे पग में आकाश ले लिया; तीसरे पग के लिए बलि ने अपना शिर अर्पित किया। वामन ने उसका शिर दबाकर उसे सुतल लोक का राज्य दिया तथा वरदान दिया कि वे स्वयं उसके राज्य में द्वार-पाल बनकर रहेंगे।

    इसी प्रसंग की परंपरा से चातुर्मास जुड़ा, आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विष्णु योग-निद्रा में लीन होकर बलि के सुतल-लोक में निवास करते हैं तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी) को जाग्रत होकर क्षीरसागर में अपने विराजमान स्थान पर लौटते हैं। इन चार मासों में विवाह, गृह-प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि शुभ कार्य विराम पर रहते हैं, क्योंकि विष्णु के शयन-काल में शुभ-मुहूर्तों का प्रवाह शांत रहता है, यह परंपरा का विश्वास है।

    देवशयनी एकादशी का व्रत करने वाला व्रती विष्णु के शयन-समय का ध्यान रखता है तथा चार मास संयम-भाव से रहता है। परंपरा में इस एकादशी के व्रत से संसार-दुःख से विमुक्ति तथा वैकुंठ-प्राप्ति का फल बताया गया है। यह एकादशी व्रती को त्याग एवं धैर्य का अभ्यास कराती है, ऋतु-संक्रमण (वर्षा आरंभ) के समय शरीर-हित का संयमित आहार-विहार भी इस व्रत का व्यावहारिक उपदेश है।

    सामान्य प्रश्न

    चातुर्मास आरंभ, विष्णु शयन; शुभ कार्यों का विराम

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