
देवता
सूर्य देव (उगते एवं डूबते), छठी मैया एवं यमराज-प्रसंग
तिथि / समय
कार्तिक शुक्ल षष्ठी (कुछ गुरु-परंपरा में अन्य मास भी, पर प्रमुख कार्तिक)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा की कथा में प्रियंवत राजा तथा उनकी पत्नी मालिनी देवी का प्रसंग है, छठी मैया की उपासना से उन्हें संतान की प्राप्ति हुई थी। कथा के अनुसार मालिनी देवी ने गर्भ धारण किया, परंतु संतान निर्माण में विघ्न उत्पन्न हुआ। ऋतु-पात होते ही राजा-रानी दुःखी हो गए। मालिनी ने सप्न में छठी मैया (षष्ठी देवी) की आराधना का संकेत पाया।
व्रत विधि
कैसे रखें
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चार दिन की विधि है, दिन 1 नहाय-खाय (शुद्ध सात्विक भोजन के बाद व्रत-आरंभ), दिन 2 खरना/खरनिया (सायं उपवास के बाद गुड़- कद्दू-चावल का खीर भोजन, जो सभी को बाँटा जाता है), दिन 3 संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को डाला सजाकर अर्घ्य, ठेकुआ, फल, गन्ना आदि का प्रसाद), दिन 4 भोर का अर्घ्य (उगते सूर्य को अर्घ्य) तथा विधिपूर्वक पारण। व्रती (पारवैतिन) निराजल नियम से अर्घ्य देती है; शुद्धता (बासी अन्न न लेना, सात्विक व्यवहार) का सख्त पालन होता है। डाला सजाने में गन्ना, कद्दू, नारियल व ठेकुआ का विशेष स्थान है।
पूजा सामग्री
- डाला/डालिया (बाँस की टोकरी)
- ठेकुआ (खजूर-गेहूँ का पकवान)
- लवण-अक्षत
- गंगाजल
- सुपारी
- नारियल
- गन्ना
- कद्दू- शकरकंद
- सूखी डाल
- दीप-धूप
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संतान की दीर्घायु एवं रक्षा, रोग-नाश, समृद्धि एवं प्रकृति-कृपा।
व्रत कथा
परंपरा की कथा में प्रियंवत राजा तथा उनकी पत्नी मालिनी देवी का प्रसंग है, छठी मैया की उपासना से उन्हें संतान की प्राप्ति हुई थी। कथा के अनुसार मालिनी देवी ने गर्भ धारण किया, परंतु संतान निर्माण में विघ्न उत्पन्न हुआ। ऋतु-पात होते ही राजा-रानी दुःखी हो गए। मालिनी ने सप्न में छठी मैया (षष्ठी देवी) की आराधना का संकेत पाया।
छठी मैया के कथानुसार उन्होंने रानी से कहा, 'षष्ठी तिथि मेरी है। तुम कार्तिक शुक्ल षष्ठी को विधिपूर्वक नदी-जल में स्नान करके उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य दो। तुम्हारी संतान की रक्षा मैं स्वयं करूँगी।' मालिनी ने वैसा ही किया तथा उसे सुंदर संतान प्राप्त हुई। परंपरा में षष्ठी देवी संतान की रक्षक तथा सूर्य-षष्ठी के अर्घ्य से बाल-रक्षा का विश्वास जुड़ा रहा है।
दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग महाभारत-परंपरा से जुड़ा लोक-विश्वास है, कर्ण सूर्य-पुत्र थे, इसीलिए कार्तिक षष्ठी पर वे सूर्य को अर्घ्य देते थे तथा अनेक प्राणियों के रोग दूर करते थे। कर्ण की उपासना-शैली के अनुरूप ही सूर्य-अर्घ्य की प्रक्रिया बनती गई। लोक-परंपरा में एक और कथा प्रसंग है कि द्रौपदी के भाइयों की रक्षा या संतान-सुख के लिए भी छठ-व्रत का प्रारंभ हुआ, जो कार्तिक में सूर्य-षष्ठी से जुड़कर व्यापक हुआ।
छठ पूजा का मूल भाव प्रकृति-उपासना है, उगता सूर्य जीवन-संतुलन का, डूबता सूर्य कृतज्ञता का तथा छठी मैया संतान-रक्षा का प्रतीक है। नदी-जल, बाँस की टोकरी, गन्ना, कद्दू जैसी स्थानीय सामग्री से यह पर्व प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देता है। व्रत का विश्वास है कि छठ के अर्घ्य से संतान की दीर्घायु, रोग-नाश तथा परिवार की समृद्धि होती है। चार दिन के नियम-शुद्ध पालन से मनोकामना पूर्ण होती है, यह अटल लोक-विश्वास है।
सामान्य प्रश्न
संतान की दीर्घायु एवं रक्षा, रोग-नाश, समृद्धि एवं प्रकृति-कृपा।
