
देवता
सूर्य देव
तिथि / समय
माघ शुक्ल सप्तमी (वर्ष में सात भानु-सप्तमियाँ, रवि-योग वाली विशेष)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा में सूर्य देव की सात रथ-घोड़ों सहित उपासना का विशेष महत्व इस तिथि से जुड़ा है। कथा-संग्रहों में वर्णन आता है कि सूर्य का रथ सात घोड़ों से खींचा जाता है, जो सात रंगों (सप्तरंग किरणों) तथा सात वायु-तत्त्वों के प्रतीक हैं। रथ का एक पहिया बारह तीलियों से युक्त है, जो बारह मासों का द्योतक माना गया है। माघ शुक्ल सप्तमी को सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ने की परंपरा से जुड़ा शुभ प्रसंग बना, यही रथ सप्तमी है।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
प्रातः सूर्य-अर्घ्य दें, लोटे से सात बार जल-अर्घ्य का क्रम चलाएँ। गायत्री-जप करें। गेहूँ, गुड़ एवं तांबे का दान करें। उपवास वैकल्पिक है। रथ सप्तमी के दिन सूर्य के सात घोड़ों वाले रथ का चित्र बनाकर पूजा की जाती है। सात प्रकार के अन्न/दान की परंपरा भी है। तर्पण एवं अर्घ्य में लाल पुष्प डालकर सूर्य-देव को समर्पित करें।
पूजा सामग्री
- तांबा
- जल-लोटा
- लाल पुष्प
- गेहूँ
- गुड़
- अक्षत
- रथ-चित्र (सात घोड़ों वाला)
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
आरोग्य, दृष्टि-बल, तेज एवं यश-वृद्धि।
व्रत कथा
परंपरा में सूर्य देव की सात रथ-घोड़ों सहित उपासना का विशेष महत्व इस तिथि से जुड़ा है। कथा-संग्रहों में वर्णन आता है कि सूर्य का रथ सात घोड़ों से खींचा जाता है, जो सात रंगों (सप्तरंग किरणों) तथा सात वायु-तत्त्वों के प्रतीक हैं। रथ का एक पहिया बारह तीलियों से युक्त है, जो बारह मासों का द्योतक माना गया है। माघ शुक्ल सप्तमी को सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ने की परंपरा से जुड़ा शुभ प्रसंग बना, यही रथ सप्तमी है।
कथा-परंपरा में एक प्रसिद्ध प्रसंग यह भी है कि रथ सप्तमी के दिन सूर्य को स्नान-अर्घ्य प्रदान करने से स्वयं भगवान विष्णु को प्रसन्नता होती है। स्कंद-पुराण-परंपरा में यह तिथि सूर्य-माहात्म्य की स्मृति के रूप में मनाई जाती है। कार्तिक-परंपरा से जुड़ी स्नान-आयोजना भी इस दिन से जुड़ी रही।
माघ में स्नान-दान के साथ सूर्य-अर्घ्य का संयोग विशेष फलदायी माना गया है। एक लोक-कथा-प्रसंग यह भी प्रचलित है, एक निर्धन किसान था जिसकी दृष्टि कमज़ोर हो गई थी। सात सप्तमियों तक उसने प्रातः अर्घ्य-दान का विधान अपनाया तथा तांबे के लोटे से सूर्य को जल समर्पित किया। परंपरा के अनुसार उसकी दृष्टि एवं आरोग्य दोनों सुधर गए। वर्ष में आने वाली सात भानु-सप्तमियों में रवि-योग से युक्त सप्तमी सर्वश्रेष्ठ फल देने वाली मानी गई है।
भानु सप्तमी का व्रत आरोग्य, दृष्टि-शक्ति एवं यश की देव-प्राप्ति कराता है। सूर्य-अर्घ्य में जल की धारा को देखते हुए गायत्री मंत्र का जाप करना इस व्रत का विशिष्ट विज्ञान-सम्मत अंग है, कोमल किरणों का दर्शन नेत्र-स्वास्थ्य के लिए परंपरा में शुभ माना गया है। सात घोड़ों की पूजा से सात रंगों (सप्तरंग) की शक्तियों का संतुलन जीवन में आता है, यह भाव परंपरा में प्रतिपादित है।
सामान्य प्रश्न
आरोग्य, दृष्टि-बल, तेज एवं यश-वृद्धि।
