
देवता
सूर्य देव (कथा-परंपरा) एवं शिव-पार्वती; बहुला (कथा-नायिका)
तिथि / समय
वैशाख कृष्ण चतुर्थी (सूर्य-ग्रहण-प्रसंग से जुड़ी कथा; क्षेत्रीय रूप भिन्न)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
कथा के अनुसार देवताओं के कहने पर सूर्य देव ग्रहण बन गए थे; व्रती स्त्रियों ने भक्ति से सूर्य देव को मना लिया और ग्रहण से रक्षा की थी। कथा इस प्रकार है, एक बार देवताओं ने सूर्य देव से विनती की कि वे ग्रहण-रूप धारण करें ताकि भूतल के संचित पापों का निराकरण हो सके। सूर्य देव ग्रहण-रूप में प्रकट हुए, उनकी किरणें निर्गुण हो गईं तथा धरती पर भय का वातावरण बन गया।
व्रत विधि
कैसे रखें
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उपवास रखें। सूर्य-शिव-पार्वती की पूजा करें, बहुला कथा का श्रवण करें तथा सायं पारण करें। ग्रहण-काल के नियम (स्नान-दान, सूर्य-स्मरण) से जुड़ी विधियाँ इस व्रत में समाहित हैं, ग्रहण-काल में भोजन-त्याग तथा सूर्य की उपासना का विधान जुड़ा है। सूर्य को जल-अर्घ्य दें तथा दान करें। बहुला-कथा का गायन करने वाली स्त्रियाँ सौभाग्य-रक्षा का आशीवाद माँगती हैं।
पूजा सामग्री
- सूर्य-पूजा सामग्री (जल-लोटा
- लाल पुष्प)
- कथा-पोथी
- फूल-प्रसाद
- दान-सामग्री
- दीप
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
सौभाग्य-रक्षा, संतान-रक्षा, पाप-नाश एवं आरोग्य।
व्रत कथा
कथा के अनुसार देवताओं के कहने पर सूर्य देव ग्रहण बन गए थे; व्रती स्त्रियों ने भक्ति से सूर्य देव को मना लिया और ग्रहण से रक्षा की थी। कथा इस प्रकार है, एक बार देवताओं ने सूर्य देव से विनती की कि वे ग्रहण-रूप धारण करें ताकि भूतल के संचित पापों का निराकरण हो सके। सूर्य देव ग्रहण-रूप में प्रकट हुए, उनकी किरणें निर्गुण हो गईं तथा धरती पर भय का वातावरण बन गया।
गाँव की एक सती स्त्री, बहुला, जो विधि-निष्ठ पतिव्रता थी, ने ग्रहण-काल में उपवास धारण किया तथा अपनी व्रती सखियों के साथ सूर्य की उपासना आरंभ की। उन्होंने कथा-गीतों में सूर्य देव की स्तुति की तथा अर्घ्य-जल समर्पित किया। सूर्य देव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए तथा ग्रहण-दशा से मुक्त हो गए, संसार को फिर पूर्ण प्रकाश मिल गया।
बहुला की निष्ठा का यही प्रसंग व्रत-परंपरा से जुड़ा, जिस तिथि को ग्रहण-स्मृति जुड़ी, उस चतुर्थी का व्रत 'बहुला चौथ' के नाम से प्रचलित हुआ। परंपरा में इस दिन सूर्य की विशेष उपासना तथा ग्रहण-काल के नियमों का पालन किया जाता है।
व्रत का फल सौभाग्य-रक्षा एवं संतान-रक्षा माना गया है। कुछ लोक-संस्करणों में बहुला की संतान-रक्षा तथा पति-रक्षा की कथाएँ जुड़ी हैं, बहुला नाम की सती की व्रत-निष्ठा से संकट-नाश का प्रतीक इस व्रत की पहचान है। सूर्य-उपासना एवं दान-धर्म के संयोग से यह व्रत पाप-नाश एवं आरोग्य का फल देता है, यह लोक-विश्वास प्रचलित है। वैशाख की शुद्ध-शांत वातावरण में मनाए जाने वाले यह व्रत उत्तर-पूर्वी अंचल की स्त्री-परंपरा का प्रतीक है।
सामान्य प्रश्न
सौभाग्य-रक्षा, संतान-रक्षा, पाप-नाश एवं आरोग्य।
