Aur Vrat Vrat

बछ बारस (गोवत्स द्वादशी)

परंपरा में गाय को लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है और गो-सेवा से समस्त देवताओं की प्रसन्नता का वर्णन मिलता है। पद्म पुराण की गो-माहात्म्य परंपरा में कथा आती है कि …

बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) व्रत

देवता

गाय (गौमाता) एवं गोवत्स (बछड़ा), कृष्ण-परंपरा

तिथि / समय

कार्तिक शुक्ल द्वादशी (दीपावली के दूसरे दिन, वासू बारस/गौ-बारस)

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा में गाय को लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है और गो-सेवा से समस्त देवताओं की प्रसन्नता का वर्णन मिलता है। पद्म पुराण की गो-माहात्म्य परंपरा में कथा आती है कि समुद्र-मंथन से निकली उत्तम वस्तुओं में कामधेनु गाय थी, जो वरदान देने वाली थी। कामधेनु की संतति धरती पर गौमाता के रूप में विचरण करती है, इसी परंपरा से गोवत्स (बछड़े) की पूजा का विधान बना।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    गाय-बछड़े का स्नान कराकर श्रृंगार करें, हल्दी-कुमकुम, फूल-माला तथा वस्त्र से सजाएँ। गाय की पूजा करें, गो-पूजा मंत्र पढ़ें, गुड़-रोटी का गो-ग्रास खिलाएँ तथा गौशाला की परिक्रमा करें। कथा का श्रवण करें। गाय के गले में घंटी-पट्टा बाँधने की परंपरा है। गौ-दान (पुण्य की दृष्टि से गाय का दान-संकल्प) करने वाले गृहस्थ भी हैं। माताएँ संतान के मंगल की कामना से बारस का व्रत रखती हैं।

पूजा सामग्री

  • गाय-बछड़ा
  • हल्दी-कुमकुम
  • गुड़
  • रोटी (गो-ग्रास)
  • फूल-अक्षत
  • दीप
  • वस्त्र-आभूषण (श्रृंगार)

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

गौ-कृपा से समृद्धि, संतान-मंगल, पितृ-तृप्ति एवं ऋण-मुक्ति।

व्रत कथा

परंपरा में गाय को लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है और गो-सेवा से समस्त देवताओं की प्रसन्नता का वर्णन मिलता है। पद्म पुराण की गो-माहात्म्य परंपरा में कथा आती है कि समुद्र-मंथन से निकली उत्तम वस्तुओं में कामधेनु गाय थी, जो वरदान देने वाली थी। कामधेनु की संतति धरती पर गौमाता के रूप में विचरण करती है, इसी परंपरा से गोवत्स (बछड़े) की पूजा का विधान बना।

कथा-परंपरा यह भी है कि कार्तिक शुक्ल द्वादशी को भगवान कृष्ण ने स्वयं गायों एवं बछड़ों की पूजा करके गो-सेवा का उदाहरण दिया था, गोकुल में नंद-यशोदा के घर प्रतिदिन गाय-पूजा होती थी, पर कार्तिक में यह पूजा विशेष वैभव से होती थी। कृष्ण ने गोप-गोपियों के साथ मिलकर गायों को नहलाया, सजाया तथा उन्हें पग-फेर दिया। इसी लीला की स्मृति में गोवत्स द्वादशी का व्रत प्रचलित हुआ।

लोक-परंपरा में एक प्रसंग यह भी जुड़ा है कि एक गृहिणी ने बछड़े की भूख की उपेक्षा की, जिससे उसके घर की समृद्धि प्रभावित हुई। जब उसने विधिपूर्वक गो-पूजा एवं गो-ग्रास का नियम अपनाया, तब उसके घर पुनः अन्न-धन की बहुतात आई। इस कथा का संदेश है कि गौमाता की सेवा-उपेक्षा का प्रत्यक्ष फल घर की समृद्धि में दिखता है।

व्रत का फल परंपरा में विशेष माना गया है, गो-सेवा से पितृ-प्रसन्नता (गाय में विचरण करते देवताओं की उपासना हो जाती है), घर की लक्ष्मी स्थिर रहती है, संतान-मंगल होता है तथा ऋण-मुक्ति का विश्वास भी जुड़ा है। दीपावली के पर्व-क्रम में यह तिथि 'वासू बारस' के नाम से महाराष्ट्र में संतान-मंगल के लिए विशेष रूप से मनाई जाती है, माताएँ बालक की दीर्घायु के लिए गाय का आशीर्वाद लेती हैं। गो-माता की रक्षा एवं सेवा का यह पर्व भारतीय ग्राम-संस्कृति का आधार-स्तंभ बना।

सामान्य प्रश्न

गौ-कृपा से समृद्धि, संतान-मंगल, पितृ-तृप्ति एवं ऋण-मुक्ति।

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