Aur Vrat Vrat

अमावस्या व्रत

परंपरा में अमावस्या पितृों की तिथि मानी गई है; इस दिन तर्पण करने से पितृ तृप्त होते हैं और वंश में अनुकूल वातावरण बनता है। महाभारत की कर्ण-पितृ कथा इस विषय का प…

अमावस्या व्रत व्रत

देवता

पितृगण एवं ग्रह-शांति (विष्णु-उपासना सहित)

तिथि / समय

प्रत्येक मास की कृष्ण अमावस्या

श्रेणी

Aur Vrat व्रत

व्रत का परिचय

परंपरा में अमावस्या पितृों की तिथि मानी गई है; इस दिन तर्पण करने से पितृ तृप्त होते हैं और वंश में अनुकूल वातावरण बनता है। महाभारत की कर्ण-पितृ कथा इस विषय का प्रसिद्ध उदाहरण है, दानवीर कर्ण मृत्यु के उपरांत स्वर्ग में पहुँचे, परंतु वहाँ उन्हें सोने की भाँति चमकता अन्न मिला, जो भोजन करने योग्य नहीं था। इंद्र से इसका कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि कर्ण ने जीवन भर सोना दान किया, किंतु पितरों का अन्न-तर्पण कभी नहीं किया। इसीलिए अब वे अन्न के अधिकारी नहीं रहे।

व्रत विधि

कैसे रखें

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    प्रातः स्नान के बाद पितृ-तर्पण करें, काले तिल एवं जल के मिश्रण से तीन आहुतियाँ देकर पितरों का स्मरण करें। तिल-जल-अर्घ्य दें, ब्राह्मण-भोजन अथवा अन्न-दान करें। ग्रह-शांति हेतु नवग्रह पूजा करें। दीपदान का विशेष महत्त्व है। उपवास रखकर सायं एक समय शुद्ध भोजन करें। श्राद्ध-कता पितरों के नाम बोलकर विधिपूर्वक तर्पण संपन्न करते हैं।

पूजा सामग्री

  • काले तिल
  • जल-कलश
  • कुशा
  • दीप
  • तर्पण-पात्र
  • अन्न-दान

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
  • संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।

पारण विधि

पितृ-तृप्ति, वंश-कल्याण, पाप-क्षय एवं गृह-शांति।

व्रत कथा

परंपरा में अमावस्या पितृों की तिथि मानी गई है; इस दिन तर्पण करने से पितृ तृप्त होते हैं और वंश में अनुकूल वातावरण बनता है। महाभारत की कर्ण-पितृ कथा इस विषय का प्रसिद्ध उदाहरण है, दानवीर कर्ण मृत्यु के उपरांत स्वर्ग में पहुँचे, परंतु वहाँ उन्हें सोने की भाँति चमकता अन्न मिला, जो भोजन करने योग्य नहीं था। इंद्र से इसका कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि कर्ण ने जीवन भर सोना दान किया, किंतु पितरों का अन्न-तर्पण कभी नहीं किया। इसीलिए अब वे अन्न के अधिकारी नहीं रहे।

कर्ण ने विनती की कि उन्हें पुनः मर्त्यलोक में अवसर दिया जाए। उन्हें चौदह दिन के लिए पृथ्वी पर भेजा गया, जिसमें अमावस्या भी आई। उस अमावस्या को कर्ण ने पितरों के लिए तिल-जल एवं अन्न-दान का विधान करके तर्पण किया; तभी से अमावस्या के दिन पितृ-तर्पण की परंपरा और भी दृढ़ हुई। यह प्रसंग पितृ-ऋण के महत्त्व का प्रतीक बना, धन-दान के बिना अन्न-दान अधूरा माना गया।

लोक-परंपरा में एक कथा यह भी है कि एक गृहस्थ ने अमावस्या की रात्रि में भोजन आरंभ कर दिया तथा बाहर दीप नहीं जलाया। उसी रात्रि उसके द्वार पर किसी पथिक ने भोजन माँगा, पर घर के अंधकार से वह लौट गया। परंपरा कहती है कि अमावस्या की रात्रि का दीपदान यात्रा-रक्षा एवं पितृ-तृप्ति दोनों का कारण है।

अमावस्या व्रत का निष्कर्ष यह है कि इस दिन तर्पण, दीपदान तथा अन्न-दान से पितृ कृतार्थ होते हैं और घर में सुख-शांति का संतुलन बना रहता है। शास्त्र-परंपरा में विशेष अमावस्याओं, सोमवती, शनिचरी, दीपावली आदि, का अलग महत्त्व वर्णित है। प्रत्येक अमावस्या को स्नान-दान का नियम निभाने वाले व्यक्ति के पाप-संचय का निराकरण होता है, इस विश्वास की परंपरा प्रचलित रही है।

सामान्य प्रश्न

पितृ-तृप्ति, वंश-कल्याण, पाप-क्षय एवं गृह-शांति।

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