
देवता
भगवान विष्णु
तिथि / समय
फाल्गुन शुक्ल एकादशी
श्रेणी
Ekadashi व्रत
व्रत का परिचय
आमलकी एकादशी की कथा राजा चित्रसेन के प्रसंग से जुड़ी है। कथा है कि विदिशा नगरी में राजा चित्रसेन राज्य करते थे। नगर में एक प्राचीन आंवला-वृक्ष था, जो विष्णु का प्रिय वृक्ष माना जाता था, परंपरा में आंवले को भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर इसी तिथि पर उसकी पूजा का विधान है। राजा चित्रसेन एवं नगरवासी प्रत्येक फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर उस वृक्ष के नीचे विधिपूर्वक विष्णु-पूजा करते थे।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
पूजा सामग्री
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
आंवला-पूजा एवं विष्णु-भक्ति
व्रत कथा
आमलकी एकादशी की कथा राजा चित्रसेन के प्रसंग से जुड़ी है। कथा है कि विदिशा नगरी में राजा चित्रसेन राज्य करते थे। नगर में एक प्राचीन आंवला-वृक्ष था, जो विष्णु का प्रिय वृक्ष माना जाता था, परंपरा में आंवले को भगवान विष्णु का स्वरूप मानकर इसी तिथि पर उसकी पूजा का विधान है। राजा चित्रसेन एवं नगरवासी प्रत्येक फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर उस वृक्ष के नीचे विधिपूर्वक विष्णु-पूजा करते थे।
एक वर्ष राजा चित्रसेन वन में शिकार को गए। वहाँ भटकते हुए वे थककर एक स्थान पर बैठ गए। उसी स्थान पर दैत्यों का एक समूह आ पहुँचा, जो राजा को खा जाने के लिए उद्यत हुआ। राजा शस्त्रहीन था। उस संकट की घड़ी में राजा को स्मरण हुआ कि आमलकी एकादशी का व्रत-पुण्य उनके जीवन में संचित है। उसी क्षण देखा गया कि राजा के देह से एक दिव्य तेज निकला तथा विष्णु का चक्र-स्वरूप प्रकट होकर दैत्यों का विनाश कर दिया।
राजा सकुशल नगर लौटे तथा उन्होंने इस चमत्कार का श्रेय आमलकी एकादशी के व्रत को दिया। नगर में उत्सव मनाया गया तथा आंवला-वृक्ष की पूजा की परंपरा और दृढ़ हुई। आमलकी एकादशी के व्रत से व्रती के समस्त पाप नष्ट होते हैं, उसे विष्णु-रक्षा का आश्रय प्राप्त रहता है तथा संकट में चक्र-रक्षा का विश्वास जुड़ा है। आंवले में विष्णु का वास मानकर इस दिन आंवले को भोग लगाने, उसके नीचे भोजन करने तथा दान करने की परंपरा है, वृक्ष-पूजा का यह विधान पर्यावरण-संरक्षण का प्राचीन संदेश भी देता है।
सामान्य प्रश्न
आंवला-पूजा एवं विष्णु-भक्ति
