
देवता
भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी-नारायण
तिथि / समय
वैशाख शुक्ल तृतीया
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
परंपरा में यह तिथि अक्षय (अविनाशी) फलदायी मानी गई है। कथाओं में इसी दिन द्रौपदी को अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था। महाभारत की परंपरा के अनुसार जब पांडव वनवास में थे तथा अनेक ऋषि-मुनि बिना सूचना के उनके आश्रय पर आ जाते थे, तब भोजन की व्यवस्था एक बड़ी समस्या थी। श्रीकृष्ण एक बार पांडवों के पास आए तथा द्रौपदी से कुछ भोजन माँगा। उस समय सूर्यास्त हो चुका था तथा पात्र में एक अन्न-रज के अतिरिक्त कुछ नहीं था।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
उपवास वैकल्पिक रखें। विष्णु-लक्ष्मी पूजा करें। अन्न, जल-कुम्भ, वस्त्र, छाता-चप्पल, गौ-दान एवं गौ-पूजा करें, 'अक्षय दान' अर्थात् जिसका फल अविनाशी रहे। तुलसी पूजा का विशेष महत्त्व है। इस दिन शुभ कार्य, विवाह, गृह-प्रवेश, अक्षय-पात्र संबंधी ऋण-मुक्ति आदि, बिना मुहूर्त देखे संपन्न किए जा सकते हैं, ऐसी परंपरा है। खीर-प्रसाद बाँटने का विधान है। कुछ गृहस्थ इस दिन सत्यनारायण व्रत भी करते हैं।
पूजा सामग्री
- दान-सामग्री (अन्न
- जल-कुम्भ
- वस्त्र
- छाता-चप्पल)
- विष्णु चित्र
- गौ-पूजा सामग्री
- तुलसी
- खीर (भोग)
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
दान का अक्षय फल, धन-धान्य-समृद्धि, ऋण-मुक्ति एवं अन्न-संतुलन।
व्रत कथा
परंपरा में यह तिथि अक्षय (अविनाशी) फलदायी मानी गई है। कथाओं में इसी दिन द्रौपदी को अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था। महाभारत की परंपरा के अनुसार जब पांडव वनवास में थे तथा अनेक ऋषि-मुनि बिना सूचना के उनके आश्रय पर आ जाते थे, तब भोजन की व्यवस्था एक बड़ी समस्या थी। श्रीकृष्ण एक बार पांडवों के पास आए तथा द्रौपदी से कुछ भोजन माँगा। उस समय सूर्यास्त हो चुका था तथा पात्र में एक अन्न-रज के अतिरिक्त कुछ नहीं था।
द्रौपदी ने संकोच करते हुए वही अंतिम अंश श्रीकृष्ण को दे दिया। कृष्ण ने उसे ग्रहण करके भगवान विष्णु की तृप्ति से प्रसन्न होकर द्रौपदी को 'अक्षय पात्र' का वरदान दिया, जिससे पात्र में अन्न वैसे तपता रहे जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन करके तृप्त न हो जाए। इस अक्षय पात्र के दान से पांडवों एवं समस्त अतिथियों का पोषण वनवास भर संपन्न रहा। इसी प्रसंग से तृतीया तिथि का 'अक्षय' फल प्रसिद्ध हुआ।
दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग सुदामा का है, इसी तिथि पर निर्धन ब्राह्मण सुदामा अपनी पत्नी के कहे पर पोटली भर चिउड़े (पोहा-पुष्प) लेकर द्वारका में श्रीकृष्ण के दर्शन को गया था। कृष्ण ने अत्यंत प्रेम से स्वयं पानी माँगकर सुदामा को आसन दिया, उसकी चिउड़े की पोटली खोली तथा स्वयं उन्हें चखा और बहुत प्रेम दिया। सुदामा क्रोधात्मक संकोच से कृष्ण से कुछ माँग नहीं पाया। द्वारका से लौटकर उसने देखा कि उसका टूटा-फूटा घर वैभवपूर्ण राजमहल बन गया है। इस दिन का दान एवं प्रेम-पूजा अक्षय फल करती है, यही इस कथा का संदेश है।
अक्षय तृतीया को कई परंपराओं में त्रेता-युग का आरंभ, परशुराम जयंती एवं गंगा-प्रवाह से संबंधित भी माना गया है। इस दिन किया गया दान-पुण्य अक्षय रहता है, अन्न-दान इस दिन विशेष फलदायी माना गया है। जो इस दिन विष्णु-भक्ति एवं गौ-सेवा करते हैं, उनका जीवन ऐश्वर्य-संपन्न रहता है। ऐसा विश्वास परंपरा में दृढ़ है।
सामान्य प्रश्न
दान का अक्षय फल, धन-धान्य-समृद्धि, ऋण-मुक्ति एवं अन्न-संतुलन।
