
देवता
अहोई माता
तिथि / समय
कार्तिक शुक्ल अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी से आठ दिन बाद; दीपावली से पूर्व)
श्रेणी
Aur Vrat व्रत
व्रत का परिचय
लोक-कथा के अनुसार एक साँप सात पुत्रों वाली स्त्री के छोटे पुत्र को उठा ले गया था; स्त्री ने आँख बंद करके अहोई माता की उपासना की और उसकी कृपा से पुत्र को पुनः प्राप्त किया था। कथा इस प्रकार है, एक गाँव में सात-पुत्रों वाली एक स्त्री रहती थी। एक दिन वह सातों बहू-बेटियों के साथ नई मिट्टी खोदने गई। कुदाल चलाते समय उसके छोटे पुत्र की कुदाल से स्याहिनी (स्यार-दीवार बनाने वाले जीव) के बच्चों को चोट पहुँच गई, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
व्रत विधि
कैसे रखें
- 1
अष्टमी के दिन उपवास रखें। दीवार पर अहोई माता की चित्रकला बनाएँ, माता के साथ सात पुत्र, सात बहनें, सूरज-चंद्र-तारे, चूहा एवं स्याहिनी (स्यार) के चित्र। कथा-पात्रों के चित्र बनाकर पूजा करें, अर्घ्य दें तथा अहोई कथा सुनें। संतान के कल्याण की प्राथना करें। सायं पारण करें, हलवा-पूरी का भोग लगाएँ। स्वर्ण-चूहा (सोने का चूहा) या चाँदी का दान विशेष विधान है। लाल सूत को कथा संबंधित स्थान पर बाँधने की परंपरा भी है।
पूजा सामग्री
- अहोई माता चित्र/चित्रकला सामग्री (गेरू/अवीकल)
- कथा-पात्रों के चित्र
- हलवा-पूरी
- स्वर्ण-चूहा (दान)
- लाल सूत
- जल- कलश
व्रत के नियम
- व्रत के दिन सात्विक आहार लें और देवता का स्मरण करते रहें।
- संभव हो तो उपवास रखें; न हो तो सात्विक भोजन करें।
पारण विधि
संतान की दीर्घायु एवं रक्षा; पुत्र-सुख की प्राप्ति।
व्रत कथा
लोक-कथा के अनुसार एक साँप सात पुत्रों वाली स्त्री के छोटे पुत्र को उठा ले गया था; स्त्री ने आँख बंद करके अहोई माता की उपासना की और उसकी कृपा से पुत्र को पुनः प्राप्त किया था। कथा इस प्रकार है, एक गाँव में सात-पुत्रों वाली एक स्त्री रहती थी। एक दिन वह सातों बहू-बेटियों के साथ नई मिट्टी खोदने गई। कुदाल चलाते समय उसके छोटे पुत्र की कुदाल से स्याहिनी (स्यार-दीवार बनाने वाले जीव) के बच्चों को चोट पहुँच गई, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
स्याहिनी दुखी होकर उस स्त्री के घर आई और उसके पुत्र को अपने वश में करके ले गई। छोटा पुत्र निद्रा में डूबा हुआ गायब हो गया। जब पुत्र नहीं मिला तो उस स्त्री ने अपने छोटे पुत्र की खोज की तथा देव-दरवाज़े से ज्ञान मिला कि स्याहिनी उसे ले गई है। स्त्री ने गुरु-परंपरा से अहोई माता की उपासना का विधान जाना, गेरू से अहोई का चित्र बनाकर, सात बहनों-पुत्रों के चित्र बनाकर तथा स्याहिनी के पुत्रों के प्रति क्षमा-भाव से पूजा करने से माता प्रसन्न होंगी।
अहोई माता प्रसन्न हुईं तथा उन्होंने स्याहिनी पर प्रभाव डालकर पुत्र को वापस करा दिया। तब से संतान की रक्षा हेतु कार्तिक शुक्ल अष्टमी को अहोई व्रत का प्रारंभ हुआ। माता ने वरदान दिया कि जो स्त्री विधिपूर्वक अहोई का व्रत करेगी, उसकी संतान दीर्घायु होगी तथा उसके पुत्रों की रक्षा मैं करूँगी।
व्रत की विशेषता यह है कि यह माँ अपनी संतान (विशेषकर पुत्र, परंतु अब सभी संतान) के लिए रखती है। निराहार व्रत के साथ चित्र-पूजा की लोक-परंपरा इस व्रत की अनूठी पहचान है। स्वर्ण-चूहे का दान इसलिए किया जाता है क्योंकि कथा में चूहा स्याहिनी का पुत्र-रूप से संबंधित था, दान से उस जीव के प्रति क्षति-पूर्ति का भाव जुड़ा है। व्रत का निष्कर्ष यह है कि संतान के दीर्घ जीवन की कामना अहोई माता की कृपा से पूर्ण होती है।
सामान्य प्रश्न
संतान की दीर्घायु एवं रक्षा; पुत्र-सुख की प्राप्ति।
