
देवता
दीपक (ज्योति स्वरूप)
श्रेष्ठ समय
प्रातः और संध्या काल; कार्तिक मास और दीपावली में विशेष दीपदान।
श्रेणी
Deepak पूजा
पूजा का परिचय
दीपक केवल प्रकाश का साधन नहीं, यह ज्ञान, शक्ति और लक्ष्मी का प्रतीक है। स्कंद पुराण में दीपदान का महात्म्य वर्णित है: 'दीपो परमं ब्रह्म' अर्थात दीपक परब्रह्म का स्वरूप है।
घी का दीपक सात्विकता का प्रतीक है, तेल का दीपक दीर्घकाल तक जलता है। दीपावली, कार्तिक मास और नित्य संध्या में दीपदान से घर में समृद्धि आती है: ऐसी मान्यता है।
पूजा सामग्री
- मिट्टी/पीतल का दीपक
- घी या तेल
- रुई की बत्ती
- दीपक थाली
- रोली और चावल
- पुष्प
- धूप
- कपूर
पूजा विधि
चरण-दर-चरण
- 1
दीपक को साफ करें और घी/तेल भरें।
- 2
रुई की बत्ती लगाएँ, दक्षिण दिशा की ओर बत्ती का मुँह।
- 3
दीपक के समक्ष प्रार्थना करें, 'दीपज्योति परब्रह्म'।
- 4
रोली-चावल और पुष्प से दीपक का पूजन करें।
- 5
दीपक जलाएँ और देवताओं के समक्ष रखें, दाईं ओर।
- 6
दीप ज्योति का ध्यान करें और प्रार्थना करें।
शुभ समय
प्रातः और संध्या काल; कार्तिक मास और दीपावली में विशेष दीपदान।
महत्वपूर्ण सुझाव
- दीपक की बत्ती दक्षिण की ओर न रखें, दक्षिण दिशा यम की दिशा मानी जाती है।
- कार्तिक मास में प्रतिदिन संध्या दीपदान का विशेष फल है।
- दीपावली की रात्रि अमावस्या में घर के हर कोने में दीपक जलाएँ।
सामान्य प्रश्न
बत्ती पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें, दक्षिण दिशा वर्जित मानी गई है। दीपक स्वयं देवताओं के दाईं ओर रखें।
