
संपूर्ण कथा
राजा कौशिक अपनी विशाल सेना सहित वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे। वशिष्ठ ने अपनी दिव्य गाय नंदिनी के प्रभाव से पूरी सेना का भोजन और सत्कार कर दिया। यह देखकर राजा के मन में उस गाय को पाने की इच्छा जागी। वशिष्ठ के मना करने पर उन्होंने बलपूर्वक उसे ले जाना चाहा।
नंदिनी ने अपनी शक्ति से असंख्य सैनिक उत्पन्न कर दिए और राजा की सेना को परास्त कर दिया। राजा को समझ आ गया कि ब्रह्मबल क्षात्रबल से कहीं बड़ा है। उन्होंने राज्य त्यागकर कठोर तपस्या आरंभ की।
वर्षों की साधना और अनेक परीक्षाओं के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें ऋषि और अंत में ब्रह्मर्षि पद प्रदान किया। स्वयं वशिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि स्वीकार किया। तभी से वे महर्षि विश्वामित्र कहलाए।
कथा का संदेश
सच्चा बल तप, संयम और ज्ञान में होता है, केवल शक्ति और सत्ता में नहीं।
