
संपूर्ण कथा
इक्ष्वाकु वंश के राजा त्रिशंकु की इच्छा थी कि वे इसी शरीर के साथ स्वर्ग जाएँ। उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ से यज्ञ करने को कहा, पर वशिष्ठ ने इसे प्रकृति के नियम के विरुद्ध बताकर मना कर दिया। फिर वे वशिष्ठ के पुत्रों के पास गए, जिन्होंने क्रोध में आकर उन्हें चांडाल हो जाने का शाप दे दिया।
दुखी त्रिशंकु ने विश्वामित्र की शरण ली। विश्वामित्र ने यज्ञ आरंभ किया, पर देवता उसमें नहीं आए। तब उन्होंने अपने तपोबल से त्रिशंकु को स्वर्ग की ओर भेज दिया, पर इंद्र ने उन्हें नीचे धकेल दिया और वे सिर के बल गिरने लगे।
विश्वामित्र ने अपने तप से उन्हें आकाश में ही रोक लिया और नए नक्षत्रों तथा एक नए स्वर्ग की रचना आरंभ कर दी। घबराए देवताओं ने समझौता किया कि त्रिशंकु आकाश में तारों के बीच उलटे लटके रहेंगे। इसी से 'त्रिशंकु की तरह बीच में लटकना' कहावत प्रचलित हुई।
कथा का संदेश
प्रकृति और धर्म के नियमों का उल्लंघन करने वाली अनुचित इच्छा मनुष्य को अधर में लटका देती है।
