
संपूर्ण कथा
श्रवण कुमार अपने अंधे और वृद्ध माता-पिता की सेवा को ही अपना धर्म मानते थे। जब माता-पिता ने तीर्थ यात्रा की इच्छा प्रकट की तो श्रवण ने उन्हें कंधे पर काँवड़ में बैठाकर यात्रा करानी आरंभ की।
यात्रा के दौरान अयोध्या के वन के पास माता-पिता को प्यास लगी। श्रवण कमंडल लेकर सरयू तट पर जल भरने गए। उसी समय राजा दशरथ वहीं शिकार के लिए आए थे। उन्होंने जल भरने की आवाज को पशु की आवाज समझा और शब्दभेदी बाण चला दिया, जो श्रवण को लगा।
दशरथ को अपनी भूल का पता चला तो वे दुखी होकर श्रवण के माता-पिता के पास पहुँचे और सारा हाल बताया। पुत्र-शोक में माता-पिता ने प्राण त्याग दिए और राजा को शाप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में मर रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी पुत्र वियोग में मरोगे। यही शाप आगे चलकर श्री राम के वनवास के समय दशरथ के जीवन में पूर्ण हुआ।
कथा का संदेश
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है, और बिना सोचे-समझे किया गया कार्य गंभीर परिणाम ला सकता है।
