
संपूर्ण कथा
चेदि नरेश शिशुपाल श्री कृष्ण की बुआ का पुत्र था। जन्म के समय उसके चार हाथ और तीन नेत्र थे, और आकाशवाणी हुई कि जिसके स्पर्श से ये विकार समाप्त होंगे, वही उसका काल होगा। कृष्ण के स्पर्श से यह हुआ, तब माता ने कृष्ण से पुत्र के अपराध क्षमा करने का वचन लिया। कृष्ण ने सौ अपराध क्षमा करने का वचन दिया।
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सबसे पहले पूजा का अधिकारी कृष्ण को बनाया गया। इस पर शिशुपाल ने भरी सभा में कृष्ण का अपमान और गाली-गलौज करना आरंभ कर दिया।
जब उसके अपराध सौ से अधिक हो गए, तब श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। कहा गया है कि उसकी आत्मा कृष्ण में ही समा गई, क्योंकि वह जय-विजय के रूप में भगवान का पार्षद था।
कथा का संदेश
सहनशीलता की भी एक सीमा होती है, और अहंकार तथा निंदा का अंत निश्चित है।
