
संपूर्ण कथा
सूर्यदेव का विवाह देवशिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ था। संज्ञा अत्यंत रूपवती और धर्मपरायण थीं, किंतु सूर्यदेव के प्रचंड तेज को सहन करना उनके लिए दिन-प्रतिदिन दुष्कर होता जा रहा था। उस ताप से उनका शरीर शिथिल पड़ने लगा। अंततः संज्ञा ने अपनी तपस्या के बल पर अपने ही प्रतिरूप से एक छाया-स्त्री उत्पन्न की, जिसका नाम 'छाया' रखा।
संज्ञा ने छाया को सूर्यदेव की सेवा और अपनी संतानों के पालन का उत्तरदायित्व सौंपा और स्वयं घोड़ी का रूप धरकर वन में कठोर तपस्या के लिए चली गईं। सूर्यदेव छाया को ही संज्ञा समझते रहे। कुछ समय उपरांत माता छाया गर्भवती हुईं।
गर्भावस्था के दौरान छाया ने भगवान शिव की अत्यंत कठिन तपस्या की। ज्येष्ठ मास की तपती धूप में बिना अन्न-जल केवल महादेव के ध्यान में लीन रहने के कारण उस कठोर तप की ऊष्मा गर्भस्थ शिशु तक पहुंची, जिससे बालक का वर्ण श्याम हो गया। प्रसवोपरांत जब सूर्यदेव ने बालक के काले रंग को देखा, तो उन्होंने संदेह प्रकट करते हुए छाया का तिरस्कार किया।
अपनी माता का अपमान देख नवजात शनि ने सूर्यदेव की ओर दृष्टि डाली। शनि की उस दृष्टि मात्र से सूर्यदेव का प्रचंड तेज फीका पड़ने लगा और उनके शरीर में तीव्र पीड़ा होने लगी। यद्यपि बाद में भगवान शिव की कृपा से सूर्यदेव स्वस्थ हुए, किंतु शनिदेव ने उसी क्षण से निष्पक्ष रहकर केवल कर्म के आधार पर न्याय करने का दृढ़ संकल्प लिया।
कथा का संदेश
न्याय और कर्तव्य के सम्मुख कोई संबंध बड़ा नहीं होता; केवल निष्पक्ष कर्म ही धर्म है।
