
संपूर्ण कथा
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने वन में रहने वाले राजकुमार सत्यवान को पति रूप में चुना। सत्यवान के पिता राजा द्युमत्सेन अंधे हो चुके थे और राज्य खो चुके थे। देवर्षि नारद ने बताया कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है, फिर भी सावित्री अपने निश्चय पर अडिग रहीं और विवाह कर लिया।
वर्ष पूर्ण होने के दिन सत्यवान लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े। तभी यमराज उनके प्राण लेकर चले। सावित्री भी पीछे-पीछे चलने लगीं। उनकी विनम्रता और ज्ञानपूर्ण बातों से प्रसन्न होकर यमराज ने एक-एक करके वरदान दिए: ससुर की दृष्टि और राज्य की वापसी, पिता के सौ पुत्र, और अंत में सावित्री के स्वयं के सौ पुत्र।
पुत्रों का वरदान पति के बिना पूरा नहीं हो सकता था। इस प्रकार सावित्री की बुद्धिमत्ता से यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। सत्यवान जीवित हो उठे और राजा द्युमत्सेन को अपना राज्य भी मिल गया।
कथा का संदेश
प्रेम, धैर्य और बुद्धि के साथ किया गया संकल्प असंभव को भी संभव बना सकता है।
