
संपूर्ण कथा
अयोध्या के राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी। मंत्री सुमंत्र ने बताया कि ऋष्यशृंग मुनि के आचार्यत्व में यज्ञ करने से पुत्र प्राप्त होंगे। राजा रोमपाद के अंग देश में अकाल पड़ा था और ऋष्यशृंग के आगमन से वहाँ वर्षा हुई थी, जिनका विवाह रोमपाद की पोषित पुत्री शांता से हुआ।
दशरथ ने ऋष्यशृंग को आमंत्रित किया। अश्वमेध और पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुए। यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य पुरुष खीर का पात्र लेकर प्रकट हुए, जिसे प्रसाद के रूप में रानियों को देने को कहा गया।
राजा ने खीर कौशल्या और कैकेयी को दी और उन्होंने अपना-अपना भाग सुमित्रा को भी दिया। समय आने पर कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
कथा का संदेश
श्रद्धा और विधिपूर्वक किए गए कर्म का फल समय आने पर अवश्य मिलता है।
