
संपूर्ण कथा
महर्षि दधीचि ने देवकार्य हेतु अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। उस समय उनकी पत्नी सुवर्चा गर्भवती थीं। बालक का जन्म हुआ, परंतु पिता के वियोग में माता भी सती हो गईं। वह अनाथ बालक एक विशाल पीपल वृक्ष के नीचे उसके फलों (पीपल के गूलर) को खाकर बड़ा हुआ, जिसके कारण उनका नाम 'पिप्पलाद' पड़ा।
युवा होने पर जब पिप्पलाद को ज्ञात हुआ कि उनके पिता के देहावसान और बाल्यावस्था के दारुण कष्टों के मूल में शनि ग्रह की वक्र स्थिति थी, तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या कर ब्रह्मदंड प्राप्त किया और सीधे शनिदेव को युद्ध हेतु ललकारा।
पिप्पलाद ने ब्रह्मदंड से शनिदेव पर भीषण प्रहार किया, जिससे शनिदेव घायल होकर उसी पीपल के वृक्ष की शरण में जा छिपे। सृष्टि के संतुलन को संकट में देख स्वयं ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर पिप्पलाद को शांत किया। पिप्पलाद ने दो शर्तों पर शनिदेव को प्राणदान दिया: प्रथम, 16 वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक पर शनि पीड़ा का प्रभाव नहीं होगा; और द्वितीय, जो भी शनिवार को पीपल वृक्ष की पूजा कर दीपदान करेगा, उसे शनि के कुप्रभाव से मुक्ति मिलेगी।
शनिदेव ने दोनों शर्तें स्वीकार कीं। उसी दिन से पीपल का वृक्ष शनि कृपा और शांति का प्रमुख केंद्र बन गया।
कथा का संदेश
तपस्या और संकल्प के बल पर प्रारब्ध के कठोर नियमों को भी जनकल्याणकारी स्वरूप दिया जा सकता है।
