
संपूर्ण कथा
लंकाधिपति रावण अपने पुत्र मेघनाद को अजेय बनाना चाहता था। उसने अपने बाहुबल से सभी नवग्रहों को विवश किया कि वे मेघनाद की जन्मपत्रिका में सर्वश्रेष्ठ शुभ स्थानों पर स्थित हों। किंतु शनिदेव ने अपनी चाल बदलकर अशुभ स्थान ग्रहण कर लिया, जिससे रावण का मनोरथ पूर्ण न हो सका।
क्रुद्ध रावण ने नवग्रहों को पराजित कर अपने राजसिंहासन की सीढ़ियों पर औंधे मुंह दबा दिया। इसी बीच देवर्षि नारद ने रावण के अभिमान को उकसाते हुए कहा कि 'शत्रु की छाती पर पैर रखना ही वास्तविक पौरुष है।' रावण ने ज्यों ही ग्रहों को सीधा किया, शनिदेव की दृष्टि सीधे रावण के मुख पर पड़ी और वहीं से लंका के विनाश का चक्र आरंभ हो गया। रावण ने शनिदेव को एक घोर अंधकारमय कोठरी में जंजीरों से बांध दिया।
वर्षों बाद जब पवनपुत्र हनुमान माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उन्हें उस कारागार से एक करुण पुकार सुनाई दी। हनुमान जी ने अपनी पूंछ के प्रहार से कारागार के द्वार तोड़कर शनिदेव को बंधनमुक्त किया।
शनिदेव ने संकटमोचन से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। हनुमान जी ने प्रार्थना की कि 'जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक मेरा स्मरण करेगा या शनिवार को मेरी उपासना करेगा, उसे आपकी साढ़ेसाती अथवा वक्र दृष्टि का कष्ट न सहना पड़े।' शनिदेव ने मुस्कुराकर यह वरदान सहर्ष स्वीकार किया।
कथा का संदेश
अहंकार चाहे कितना भी प्रबल हो, नियति और ईश्वर के न्याय के आगे झुकना ही पड़ता है।
