
संपूर्ण कथा
सीताजी को लौटाने की सलाह देने पर रावण ने अपने भाई विभीषण को अपमानित किया। विभीषण श्री राम की शरण में आ गए। वानर सेना ने समुद्र पर सेतु बनाया और लंका पहुँचकर घोर युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में कुंभकर्ण श्री राम के हाथों और रावण का पुत्र इंद्रजीत लक्ष्मण के हाथों मारा गया।
अंत में राम और रावण का निर्णायक युद्ध हुआ। रावण के दस सिर बार-बार कटकर भी बढ़ते रहे। विभीषण के बताए रहस्य और महर्षि अगस्त्य द्वारा सिखाए गए आदित्य हृदय स्तोत्र से बल पाकर श्री राम ने ब्रह्मास्त्र चलाया और रावण का वध किया। इस प्रकार अधर्म पर धर्म की विजय हुई।
सीताजी की पुनः प्राप्ति के बाद विभीषण का लंका में राज्याभिषेक हुआ। चौदह वर्ष का वनवास पूरा होने पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे। नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया, और इसी परंपरा से दीपावली का पर्व मनाया जाता है। भरत ने राम को उनका सिंहासन लौटाया और रामराज्य की स्थापना हुई।
कथा का संदेश
अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली हों, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है।
