
संपूर्ण कथा
लंका का राजा रावण अत्यंत शक्तिशाली और शिवभक्त था। एक बार पुष्पक विमान से जाते हुए कैलाश पर्वत के पास उसका विमान रुक गया। नंदी ने उसे आगे जाने से रोका, तो रावण ने क्रोध में उनका उपहास किया।
अहंकार में चूर रावण ने कैलाश पर्वत को ही उठाने का प्रयास किया। भगवान शिव ने अपने पैर के अँगूठे से पर्वत को हल्का सा दबा दिया। रावण की भुजाएँ पर्वत के नीचे दब गईं और वह दर्द से चीख उठा। उसी चीख (राव) के कारण उसका नाम 'रावण' पड़ा, ऐसा उत्तरकांड में आता है।
रावण ने सहस्र वर्ष तक शिव की स्तुति की। लोक परंपरा के अनुसार उसने अपनी नसों से वीणा बजाकर और स्तोत्र गाकर शिव को प्रसन्न किया। शिवजी ने उसे क्षमा कर दिया और चंद्रहास खड्ग तथा अन्य वरदान दिए। प्रसिद्ध शिव तांडव स्तोत्र की रचना भी रावण से जोड़ी जाती है।
कथा का संदेश
अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, वह ईश्वर के सामने टिक नहीं पाता; पर सच्ची स्तुति से कृपा मिलती है।
