
संपूर्ण कथा
भविष्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में जब देवताओं की पराजय होने लगी, तब इंद्र चिंतित हुए। इंद्राणी शचि ने मंत्रों से अभिमंत्रित एक रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बाँधा। उसके प्रभाव से इंद्र को विजय प्राप्त हुई। इस प्रकार रक्षा बंधन की परंपरा का एक मूल यहीं माना जाता है।
दूसरी कथा राजा बलि से जुड़ी है। जब भगवान विष्णु वामन अवतार के बाद बलि के द्वारपाल बन गए, तब माता लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धारण करके बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा और उन्हें भाई बना लिया।
बलि ने उपहार माँगने को कहा तो लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को वैकुंठ वापस माँग लिया। तब से यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र स्नेह और रक्षा के संकल्प के रूप में श्रावण पूर्णिमा को मनाई जाती है।
कथा का संदेश
रक्षा सूत्र केवल धागा नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और रक्षा के वचन का प्रतीक है।
