
संपूर्ण कथा
अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। महर्षि विश्वामित्र ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने राजा से दान में उनका संपूर्ण राज्य माँग लिया, जिसे हरिश्चंद्र ने सहर्ष दे दिया। फिर विश्वामित्र ने दक्षिणा माँगी, जिसे चुकाने के लिए राजा को काशी जाना पड़ा।
काशी में दक्षिणा चुकाने के लिए हरिश्चंद्र ने पहले अपनी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहित को बेचा और फिर स्वयं भी एक श्मशान के स्वामी के यहाँ कार्य करने लगे। वे श्मशान में आने वाले शवों के संस्कार का कर वसूलने का काम करने लगे।
एक दिन रोहित को साँप ने डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। शैव्या पुत्र का शव लेकर श्मशान पहुँचीं। कर्तव्य निभाते हुए हरिश्चंद्र ने उनसे भी कर माँगा। उनकी इस अटल सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर देवता प्रकट हुए। रोहित को जीवन मिला और हरिश्चंद्र को उनका राज्य वापस प्राप्त हुआ।
कथा का संदेश
सत्य और कर्तव्य का पालन कठिनतम परिस्थितियों में भी न छोड़ना ही सच्ची महानता है।
