
संपूर्ण कथा
अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित शिकार के समय प्यासे होकर ऋषि शमीक के आश्रम पहुँचे। ऋषि के मौन होने से उत्तर न मिलने पर राजा ने क्रोध में एक मृत सर्प उनके गले में डाल दिया। यह जानकर ऋषि-पुत्र श्रृंगी ने शाप दिया कि सात दिन में तक्षक नाग के डसने से राजा की मृत्यु होगी।
परीक्षित ने राज्य त्याग दिया और गंगा तट पर आ गए। वहाँ महर्षि शुकदेव ने उन्हें सात दिन तक श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई। सातवें दिन तक्षक के डसने से राजा का देहांत हुआ।
उनके पुत्र जनमेजय ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प सत्र (नागयज्ञ) आरंभ किया, जिसमें असंख्य सर्प आहुति बनकर गिरने लगे। तब ऋषि आस्तीक ने अपनी स्तुति से राजा को प्रसन्न करके यज्ञ रुकवा दिया और तक्षक तथा नागवंश की रक्षा की।
कथा का संदेश
क्रोध में किया गया एक अनुचित कर्म पीढ़ियों तक कष्ट का कारण बन सकता है, पर क्षमा से विनाश रुकता है।
