Pauranik Katha

राजा नल और दमयंती की कथा

भाग्य के उतार-चढ़ाव, वियोग और पुनर्मिलन वाली राजा नल और दमयंती की कथा।

राजा नल और दमयंती की कथा कथा

संपूर्ण कथा

निषध के राजा नल और विदर्भ की राजकुमारी दमयंती ने एक-दूसरे के गुणों की प्रशंसा सुनकर प्रेम किया। स्वयंवर में चार देवता नल का रूप धारण करके आ गए, पर दमयंती ने अपनी बुद्धि से असली नल को पहचानकर वरण किया। इससे कलियुग का अंश कलि क्रोधित हो गया।

कलि के प्रभाव से नल जुए में अपना राज्य हार गए और पत्नी के साथ वन-वन भटकने लगे। एक रात नल ने दमयंती को सोया छोड़कर वन में त्याग दिया। दमयंती ने अनेक कष्ट सहकर किसी तरह अपने पिता के घर पहुँचकर शरण ली।

नल रूप बदलकर बाहुक नाम से राजा ऋतुपर्ण के सारथी बन गए और उनसे अक्षहृदय (पासों की विद्या) सीखी। दमयंती ने युक्ति से दूसरे स्वयंवर की घोषणा करवाकर नल को खोज निकाला। नल ने पुनः जुए में खेलकर अपना राज्य पाया और दोनों का सुखद मिलन हुआ।

कथा का संदेश

धैर्य, प्रेम और बुद्धि से बड़े से बड़े संकट का सामना किया जा सकता है।

सामान्य प्रश्न

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